चित्रकूट
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ श्रीमद्भगवद्गीता 2.47 श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से : “तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करना ही है। कर्मों के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। अतः तुम निरन्तर कर्म के फल पर मनन मत करो और अकर्मण्य भी मत बनो।” ************ ।। कृष्णार्पण ।। *********** चित्रकूट अपने आराध्य को जानने समझने के लिए चित्रकूट से अधिक उचित स्थान और कौन सा हो सकता है जहां रामजी ने अपने वनवास का अधिकतम समय बिताया। अपने सुखों का त्याग करते हुए तपस्वी की भांति जीवन जिया। क्यों जिया ? क्या संदेश देना चाहते थे वे जन मानस को ? यही जानना चित्रकूट की यात्रा का मुख्य उद्देश्य है। फिलहाल अपनी यात्रा के लिए प्रस्थान किया जाए । ज्यादा कुछ नहीं बस अपनी खैरियत बताते और अपने ऊपर की गई कृपा का धन्यवाद करते हुए लौटने का इरादा है। अपने देश की सुरक्षा और शांति बने रहे। देश उन्नति की रह पर अग्रसर हो। इससे अधिक कुछ भी चाहने या मांगने की इच्छा नहीं है। रामजी ने दर्शन को बुला लिया इससे ज्यादा और क्या चाहिए? _____...