चित्रकूट
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
श्रीमद्भगवद्गीता 2.47
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से : “तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करना ही है। कर्मों के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। अतः तुम निरन्तर कर्म के फल पर मनन मत करो और अकर्मण्य भी मत बनो।”
।। कृष्णार्पण ।।
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चित्रकूट
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चित्रकूट :
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पच्चीस मई नौतपे का आरम्भ और इस नौतपे को शर्मिंदा करते हुए घनघोर बरसात। फिर इस सुहावने मौसम ने जून तक अपने पैर पसार लिए जिसने मेरे सफर को आसान बना दिया। लेकिन निकलते निकलते अठारह जून की तिथि आ ही गई।
जबलपुर से चित्रकूट पांच घंटे का सफ़र, बहुत बढ़िया रास्ता…बस कहीं कहीं थोड़ा निर्माण कार्य बाकी है।
चित्रकूट आ चुका है लेकिन ना तो मनाली की तरह यहां चीड़ या देवदार के आकाश छूते वृक्ष स्वागत करते हैं ना ही समंदर की लहरें हैं जहां जोड़े अपनी जिंदगी की शुरुआत करने जाया करते हैं। यह तो एक ठीक से बसा हुआ एक कस्बा भी नहीं। देखने में बस पहाड़, जंगल और नदियां नज़र आती हैं। बेतरतीबी से गाड़ी चलाते कुछ लोकल और जरूरी सामानों के लिए सीमित दुकानें। यह स्थान आपसे पूछता है, आखिर आप यहां किस उद्देश्य से आए हैं ? पहली नज़र में चित्रकूट से आपका परिचय कुछ यूं ही होता हैं। यह स्थान अपनी परतें आसानी से नहीं खोलता।
चित्रकूट को समझने के लिए कुछ दिन यहां बिताना आवश्यक है। जब तक हम वो शहरी औपचारिक वातावरण नहीं त्यागते तब तक यह अपना परिचय नहीं देता। दरअसल यह यात्रा अयोध्या के उस युवान राजकुमार के निर्णय के प्रति अपनी आस्था और विश्वास प्रगट करने की है जिसने जीवन के समस्त सुखों का त्याग कर और योग तपस्या को जीवन का श्रेष्ठ मार्ग इंगित करते हुए सीताजी एवं अनुज के साथ जीवन के बेहतरीन ग्यारह वर्ष और छह माह इस स्थान को दे दिए।
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1.हनुमान धारा या हनुमान गढ़ी :
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राम जी के अनन्य भक्त हनुमान जी की कथा से शुरुआत करते हैं।
चित्रकूट से एक सार होते ही एक एक कर छिपे रहस्य खुलने लगते हैं। जब हनुमान जी लंका दहन के पश्चात लौटे तब अग्नि और क्रोध से उनका शरीर तप्त हो चुका था। रामजी की कृपा के सिवाय सारे उपाय व्यर्थ हुए। रामजी ने चित्रकूट स्थित एक पर्वत पर बाण चला कर जल की शीतल धारा प्रगट की जिससे हनुमानजी की वेदना शांत हुई। इसलिए इस स्थान का नाम पड़ा “हनुमान धारा”।
सीढ़ियों से, केबल कार या फिर बॉलरों जीप जिस साधन से आप जाना चाहे, लेकिन पहाड़ी का आधे घंटे का सफ़र तय करना छोटी मोटी कारों के बस की बात नहीं है।
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2.रामघाट :
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तुलसी दास चंदन घिसे, तिलक करे रघुवीर।"
रामघाट पर तुलसीदास चंदन घिस कर दो बालकों को लगा रहे हैं। तभी हनुमानजी तोते के रूप में तुलसीदास जी के कानों में कहते हैं, वे बालक असल में श्रीराम एवं लक्ष्मण हैं। तुलसीदास जी उनके चरण छू कर उनसे आशीर्वाद लेते हैं।
चित्रकूट में रामजी के रहने ठहरने का भान भविष्य के ज्ञाता ब्रह्माजी को पहले ही हो आया था। सो स्थान को शुद्ध एवं नकारात्मक शक्तियों से मुक्त करने के उद्देश्य से उन्होंने एक सौ आठ कुंडी यज्ञ किया। ब्रह्मा जी के भारत में दो ही मंदिर हैं। एक पुष्कर और दूसरा चित्रकूट में रामघाट पर।
मनभावन रामघाट के पास रामजी एवं सीताजी वनवासी भाव से पर्ण कुटी निर्मित कर तपस्वी की भांति रहने लगे। पहरे पर लक्ष्मण। इसी जगह एक मंदिर बना कर उनकी तपस्वी वेश में अलंकार रहित मूर्तियां स्थापित की गई है।
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| ( ब्रह्मा जी का मंदिर ) |
3.गुप्त गोदावरी :
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नासिक में कल कल बहती मां गोदावरी को जब राम जी के आगमन का भान हुआ तब जमीन के भीतर चट्टानों और पहाड़ों से होते हुए गुप्त रूप से रास्ता बना कर प्रभु के चरणों को शुद्ध जल से पखारने का विचार किया। गुफा में घुटनों तक जल में चलते हुए आप रामजी की उपस्थिति एवं मां गोदावरी की भक्ति का अनुभव आज भी कर सकते हैं।
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4.सती अनुसुइया मंदिर :
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5.कामता नाथ :
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अब आते हैं उस विषय पर जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जिसके बगैर यह यात्रा अधूरी है।
एक सुबह कामदा गिरी का निर्जन पर्वत राम जी को वापस ले जाने आए भरत एवं संपूर्ण राजवंश परिवार के मर्यादित कोलाहल से भर जाता है। राज परिवार ने निश्चय किया वे रामजी को पुनः अयोध्या ले कर आयेंगे। इसकी अगुवाई भरत जी कर रहे हैं। रामजी के बगैर अयोध्या सूनी है। चारों ओर भगवा झंडों से युक्त और ताज़े फूलों से सजे हुए रथों पर अयोध्या की रानियां, राजकुमार सवार हैं। सभी अति उत्साहित हैं। पिता जनक अपनी पुत्री के त्याग से गौरवान्वित हैं और मां सुनयना युगों युगों तक स्मृति पटल से विस्मृत न होने वाली अपनी पुत्री के राम जी के साथ वनगमन निर्णय से किंचित भी आश्चर्य चकित नहीं है। हालांकि एक मां होने के नाते दुखी भी हैं लेकिन दूसरी और कहीं न कहीं मन में यह बात भी है कि रामजी जैसा दामाद पा कर चिंता किस बात की है ?
(हो सकता है उस वक्त उनका यह अपना ’नॉर्मल’ हो जिसके संबंध में आज विचार करना भी असंभव है। आज जब पति पत्नी ही एक दूसरे के हंता बने हो तो विचार करता हूँ ये किस यात्रा पर निकल चुका है भारतीय समाज? और कहां विलुप्त हो गई वह गौरवमयी संस्कृति ?)
लेकिन कामता नाथ इस अद्भुत परिवार के सम्मुख नतमस्तक है।
मर्यादापुरुषोतम रामजी को न मानना था वे न माने और राज परिवार के सदस्यों को खाली हाथ लौटना पड़ा। भरत की आँखों में अश्रु है और हाथों में खड़ाऊ जिन्हें वे अयोध्या के सिहासन पर विराज कर चौदह वर्ष अयोध्या का राज काज संभालेंगे।
श्री कामतानाथ संबंधों का यह अद्भुत सामंजस्य देख चकित हैं और हर्षित भी। धीरे धीरे समूह अयोध्या की ओर प्रस्थान करता है।
इधर चित्रकूट में रामजी को साढ़े ग्यारह वर्ष हो चुके थे। अब प्रस्थान करने के पल आ गए।
“तो क्या प्रभु इस रौनक से भरे स्थान को निर्जन कर जाओगे ? क्या कमी रह गई थी मेरी भक्ति में या सेवा में ? क्या प्रभु अपने भक्तों को इस तरह दारुण दुख दे सकते हैं ?”
रामजी अपने भक्त की व्यथा समझ चुके थे कहा,
“नहीं कामतानाथ मेरे यहां रहने से यह स्थान उसी तरह सिद्ध और शुद्ध हो चुका है जैसे कोई तपस्वी मंत्र को सिद्ध कर देता है।”
यह सुन कर कामता नाथ की जान में जान आई लेकिन अब भी चिंता मिटी ना थी।
“तो प्रभु क्या आदेश है ? फिर कैसे दूर होंगे दुखी जन के दुख जब आप ही प्रस्थान कर जाएंगे ?
संपूर्ण जगत को आश्रय प्रदान करने वाले रामजी को जिस पंचवटी ने आश्रय प्रदान किया तो आज वह ऋण चुकाने का जैसे वक्त आ चुका था। भक्त की तट हृदय को शांत करते हुए उन्होंने कहा,
“जो भक्त इस कामद गिरि की परिक्रमा करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं दूर होंगी और मेरी कृपा भी उस पर सदा रहेगी।”
राम जी के वचन सुन कर कामतनाथ को ढांढ़स बंधा। अश्रुपूर्ण आंखों से हृदय में संतोष की शक्ति रख भरे मन से प्रभु को विदा किया।
हमारे देश में मंदिरों की कमी नहीं वे तो जगह जगह पर है। किंतु ऐसे स्थान बहुत कम हैं जो ईश्वरीय क्रिया कलापों से सीधे सीधे जुड़े हैं फिर आप वहां वाइब्रेशंस महसूस कर सकते हैं। जैसे कि शेगांव में, जहां ईश्वर ने अपने होने का विश्वास दिलाया हैं। ध्यान में बैठ कर आप उनके दावे को महसूस कर सकते हैं।
चित्रकूट के यह स्थान अति महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन स्थानों के दर्शन से चारधाम का फल मिलता है। इसके अतिरिक्त भी चित्रकूट में बहुत से स्थान हैं। आप गोस्वामी तुलसीदास जी की लिखी रामायण के मूलप्रति भी देख सकते हैं।
ठहरने के लिए मध्य प्रदेश टूरिज्म की होटल्स, बहुत से प्रायवेट होटल और धर्मशालाओं में वातानुकूलित कमरे उपलब्ध है। भोजन नाश्ते के लिए रामघाट पर अन्नपूर्णा होटल/ रेस्टोरेंट भी बहुत बेहतर है।
फिलहाल के लिए इतना ही।
रामजी आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें...
कल्याणमस्तु सर्वेषां, विलसन्तु समृद्धयः ।सुखा: समीरणा वान्तु, भान्तु सर्वा दिश: शुभाः।।
सभी का कल्याण हो, (सबकी) समृद्धियाँ फले-फूले, सुखदायी हवा बहे, और सभी दिशाएँ शुभ हों"।
जय रामजी की...
महत्वपूर्ण अद्यतन:
(रविवार 29 जून 2025 को किया गया )
18 तारीख को सुबह ग्यारह बजे जब हम चित्रकूट के लिए निकले तब धूप खिली थी। 18 और 19 को भी मौसम साफ़ था। 20 को हनुमान गढ़ी के दर्शन कर जब दोपहर ग्यारह बारह के आसपास जबलपुर के लिए लौटे तब हल्की हलकी बारिश होने लगी। शाम पांच के आसपास जबलपुर लौटे। 22 को अखबारों में पढ़ा चित्रकूट में भारी बारिश। रास्तों पर भारी जाम और गुप्त गोदावरी को दर्शन के लिए बंद कर दिया गया है।
मुझे महसूस हुआ हृदय में सिर्फ आस्था रखी जाए फिर आगे का काम तो उस ऊपर वाले को ही करना है।
।। जय श्री राम ।।
































बहुत ही सुन्दर वर्णन
जवाब देंहटाएंधन्यवाद, आभार ..🙏🏻
हटाएंGreat Job!!
जवाब देंहटाएंThanks..🙏🏻
हटाएंबहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है
जवाब देंहटाएं👍👍👌👌🙏🙏
धन्यवाद, आभार...🙏🏻
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