यात्रा वृतान्त_1 ( कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में...)
यात्रा वृतान्त...1
कुछ दिन तो गुज़ारिए गुजरात में...
सर्वप्रथम मैं अपने पाठकों का शुक्रगुज़ार हूँ, उन्होंने अपने व्यस्त समय में से कुछ वक्त निकाल कर मेरे प्रथम दो ब्लॉग ओरछा एवं पॉन्डिचेरी पढ़े, और पसंद किये। भ्रमण मानव के स्वभाव में है, मैं और आप इससे अलग नहीं हैं।
प्रस्तुत ब्लॉग गुजरात भ्रमण पर आधारित है। पुत्र परितोष के विवाह के पश्चात उन्हें केरल जाना था। केरल के लिए उनकी फ्लाइट पुणे से थी। तय यह हुआ सभी कार से सर्वप्रथम शेंगाव और जैजूरी के दर्शन को चलें ततपश्चात उन्हें पुणे ड्रॉप कर हम दोनों गुजरात की अपनी यात्रा आरम्भ करें, और वे दोनों अपनी जीवन यात्रा। इसलिए इसमें मैंने शेगाव एवं जेजुरी को भी शामिल किया है जो रास्ते में पड़ता था।
शेंगाव और जैजूरी पर मैं बहुत दिनों से लिखना चाह रहा था। बहुत से लोग को अभी भी इन स्थानों के सम्बध में अधिक जानकारी नहीं है, परन्तु ईश्वर की इच्छा देखिये यह कार्य भी 12 जुलाई एकादशी के दिन ही पूर्ण होना था जबकि मैंने ऐसी कोई योजना बनाई भी नहीं थी।
पुणे से आगे की यात्रा मैंने ड्यूल ट्रेवलर के रूप में पूर्ण की। दूरियों के हिसाब यह मेरी पहली यात्रा थी। तो कुछ गलतिया भी होना स्वाभाविक है। मैं इसे तीन भागों में समेटने की कोशिश कर रहा हूँ।
प्रथम भाग ,
शेगांव एवं जैजुरी (कुल शब्द 2242, पढ़ने में लगने वाला समय_12 मिनिट.)
कुछ दिन तो गुज़ारिये गुजरात में...”
जबसे बच्चन जी का यह विज्ञापन सुना और पढ़ा तो गुजरात को और अधिक जानने की इच्छा हुई। बच्चनजी का हार्ड कोर फैन कौन नहीं ? फिर इतने स्नेह से किये आग्रह को टाला भी कैसे जा सकता है ? फिर अपने देश में रह कर अपने ही देश के प्रति अन्जान रहना ठीक नहीं। कैसे जाना होगा ? रूट कौन सा होगा ? और कहाँ कहाँ जाना है ?
गुज़रात के अंतिम छोर याने नारायण सरोवर, कोटेश्वर के शिव एवं लखपत के गुरूद्वारे तक मत्था टेकने की इच्छा थी।
17.12.2018(571km/0km) 7.00AM
सुबह के सात बजे हैं। चलिये अब नागपुर के लिये निकलते हैं। इस यात्रा में टोयोटा “लिवा” की परख भी होनी है। यह इन्जिनियरिंग का वो आश्चर्यजनक करिश्मा है, जिसके भरोसे यह लम्बी यात्रा महफूज भी रहने वाली थीं और आनंद देने वाली भी।
जबलपुर, नागपुर, अमरावती और पहला पड़ाव शेंगाव,
जबलपुर से शेंगाव की कुल दूरी 571 किलोमीटर और लगने वाला समय है बारह घंटे, यदि आप एक निर्धारित गति से चले और इसमें चार ठहराव शामिल कर लें।
हर बार की तरह बंजारी माता के मंदिर से पचास किलोमीटर पहले कुछ लड़के फूलों के हार ले कर खड़े हैं। वे याद भी दिला रहे हैं, मंदिर जंगल के बीचो बीच है। वहाँ हार फूल नहीं मिलते। मैं पारीतोष से गाड़ी रोकने को कहता हूँ। हमेशा की तरह दो हार लेता हूँ। रास्ते तो ऐसे हैं जैसे आप किसी नाव में बैठे हो। लिवा की गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है। हालाँकि बहुत से स्थानों पर अभी भी काम चल रहा है। नागपुर तक करीब करीब पूरा रास्ता ही ऐसा है। मेरी ड्रायविंग मेरे दिमाग की हार्ड डिस्क में भरे विचारों से प्रभावित हो कर कभी कम या ज्यादा होती रहती हैं, मगर पारीतोष की ड्राइविंग कास्टेंट है। सो पूणे तक मैं उसे यह कार्य सौप देता हूँ ।
जबलपुर से नागपुर तक भारी भरकम मशीने मार्ग निर्माण का कार्य कर रही हैं। पिछले बीस वर्षों से कुछ अंतराल से मैं इसी रास्ते से जाता रहा हूँ। इस फोर लेन परियोजना ने गति तो बढ़ा दी है, मगर बीच के बहुत सारे स्टेशन बायपास कर दिये हैं। लखनादौन का शुद्ध दूध का कलाकंद, बाईसन हाईवे ट्रीट का खाना या फिर सिवनी का वो ढाबा। अब उस तक पहुँचना ही मुश्किल है। अब बीच मे मुड़ा नहीं जा सकता। अब बात अलग हो चुकी है, नक्शे ही बदल गए हैं। कब कौन सा स्टेशन आया, कब निकल गया पता ही नहीं चलता। वक्त के साथ साथ ये बदलाव हमेशा से हर क्षेत्र में होते आये हैं और इसकी भी आदत पड़ ही जाती है। पुरानी व्यवस्था दम तोड़ चुकी होती है, और इस परिवर्तन के अब ज़रुरत भी है।
9.50AM वह देवी का मन्दिर जिसके लिये हमने हार खरीदे थे, आ चुका है। यह लखनादौन व छपारा के बीच जंगल में है। माँ की मूरत उत्साह से भर देने वाली है। दर्शन कर और थोड़ा रूक कर फिर चलते हैं।
जबलपुर सिवनी मार्ग पर सिवनी से पहले पेच टाइगर रिजर्व है। यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा अंडरपास ( मार्ग पर पुल का निर्माण किया गया है। जिससे नीचे जंगली जानवर स्वच्छंद विचरते रहें, ) यह बेहद खूबसूरत है।
01.00PM
तकरीबन लंच या ब्रेकफास्ट के वक्त आने वाला मुख्य मार्ग से लगा हुआ बाइसन रिट्रीट फोर लेन के निर्माण की भेट चढ़ गया। विश्वास ही नहीं होता अभी कुछ महिने पहले ही तो हमने 500 वर्ष पुराने बट वृक्ष के पास बने इस मध्य प्रदेश टूरिज़्म के रिसॉर्ट्स पर लंच लिया था। अब मेरे पास उसकी कुछ पुरानी फोटो ही हैं। खैर कोई बात नहीं। नागपुर अमरावती हाइवे पर 1 बजे लंच की लिए रूकते हैं।
07.00PM
अमरावती निकल चुका है और अब अकोला के बाद शेगाँव आने को है। शाम के सात बजे हैं एक बोर्ड पर लिखा है, "महाराज गजानन संस्थान के लिये दाऐ मुड़िये", मन नतमस्तक है, पहला पड़ाव बस आने को है।
शेंगाव के आनंद सागर पार्क के सम्मुख से गुजरते हुए मैं यात्रियों के लिए निर्मित आनंद विहार के पार्किंग में अपनी गाड़ी पार्क कर देता हूँ। एक सामान ले जाने वाली ट्राली जो एयरपोर्ट पर बहुतायत से पाई जाती है, लेकर अपना सामान उसमें डालता हूँ, सिर्फ दो बैग देख कर पत्नीजी के प्रति मन अगाध श्रद्धा से भर उठता है। और मन तो गदगद हो ही चुका है जिसने सिर्फ दो बैग, जी हाँ सिर्फ दो बैग में अगले सत्रह दिनों की यात्रा का पूर्ण प्रबंध कर लिया गया था, अन्यथा मेरे हर जगह कुली बनने के स्पष्ट आसार थे। साहब वो होटल वाले अपना आदमी भेजते हैं, लेकिन चेक आउट के वक्त बिखरा सामान नहीं समेटते और न ही सारा सामान उठाते हैं। पानी की बोतल, कैमरा वाला बैग, एक दरी चादर वाला बैग, एक मन्दिर के कपड़े वाला, एक सामान्य कपड़े वाला बैग, एक गर्म कपड़े वाला, एक जूते चप्पल वाला बैग, कुछ दवाइयाँ… O.M.G?...
अब मैं कम सामान रखने का राज आपको बताता हूँ। हुआ यह कि पिछले एक माह से वे बेटे के विवाह की तैयारी में लगीं हुई थीं। विवाह निपटाते निपटाते न अपना भान रहा न सामान का। बस जो याद आया, जो हाथ आया वो रख लिया। अगर पूर्ण उत्साह में होती तो उपर लिखा सारा समान साथ होता और उस सब के होने की इतनी ठोस वजहें वह मेरे सम्मुख रखतीं, कि फिर सहमत हुए बगैर मेरे पास कोई और चारा नहीं होता। बस मुझे अब इस बात की चिन्ता थीं कि वह शापिंग कर अपनी इस महा भूल की कोई पूर्ति न कर बैठे और यह सब आखिर मांडवी गुजरात में हो ही गया। क्या हुआ था ? इसकी चर्चा हम माडंवी पहुँच कर करते हैं। फिलहाल सफर की थकान है।
मन एक शावर बाथ ले कर और संस्थान के कैपस में स्थित प्रसादालय से प्रसाद पा कर सुबह तक बस सोना चाहता है। (संस्थान का कार्यालय चौबीसो घंटे खुला रहता है। अमूमन अधिक से अधिक दो घंटो में संस्थान के अपार्टमेन्ट्स में से किसी मे भी उम्रदराजो को नीचे और कम उम्र वालो को दूसरी मंजिल पर छह सौ रूपयो में सुसज्जित और आरामदायक जगह मिल जाती है। भीतर ही एक प्रसादालय भी है, जहाँ कम कींमत मे स्वादिष्ट नाश्ता और सुबह ,शाम का भोजन ग्रहण किया जा सकता है।)
संस्थान की ह्रदय को छू लेने वाली दो बातें हैं, व्यवस्था और स्वच्छता। बस जैसे ही आप यहाँ पहुँचते हैं, सबसे पहले आपका इन दोनो चीजों से परिचय होता है। स्वच्छता के लिये आसपास के चार सौ गाँव के लोगों ने यहाँ मुफ्त सेवाएँ प्रदान करने के लिये रजिस्ट्रेशन करवा रखा है। संस्थान हर व्यक्ति को प्रति वर्ष में एक या जरूरत पड़ने पर दो बार, सात सात दिनों के लिये शेंगाव बुलाता है। उनके मुफ्त रहने और खाने की व्यवस्था की जिम्मेदारी संस्थान की होती है। वे सब हमेशा श्वेत परिधान में होते हैं, जो संस्थान मुहैया करवाता है।
शेंगाव सिर्फ गजानन महाराज जो कृष्ण के अवतार है, की प्रगटस्थली ही नहीं, बल्कि यह इससे बढ़ कर एक पर्यटन स्थल की तरह विकसित हो चुका है।
अब हम आनंद सागर की ओर चलते हैं। लगभग 325 एकड़ में फैला “आनंद सागर” धरती पर ही स्वर्ग है" की परिकल्पना का यथार्थ चित्रण है, अर्थात मानव जीते जी धरती पर ही स्वर्ग बना सकता है, और इस प्रयास को जब श्री कृष्ण का आशीर्वाद मिल जाता हैं तब यह कल्पना पूरी तरह से साकार हो, बस सदा सदा के लिये ह्रदय मे बस जाती है।
संस्थान को यह जमीन मैदान के रूप में प्राप्त हुईं थी। तय किया गया कन्याकुमारी की तर्ज पर इसे विकसित किया जाए। एक बड़े शिवलिंग की आकृति बनाई गई। चारों और की मीट्टी को काट कर एक टिला सा बनाया गया। इस टिले पर एक ध्यान कक्ष बनाया गया। मीट्टी काटने से जो रिक्त स्थान पैदा हुआ उसे पानी से भर दिया गया। उसमें कमल पुष्प, श्वेत हंस और बतख छोड़ दिये गए। इससे एक वृहत शिवलिंग की आकृति उभर कर आ जाती है और यह सब बिल्कुल अद्भुत है। इसके वास्तुकार ने तो जैसे अपनी कल्पनाओं का एक अंतहीन सिलसिला ही पेश कर दिया है और धरती पर स्वर्ग की परिकल्पना यथार्थ में साकार करने में पूर्णतः सफल हुए हैं।
शेगांव व आसपास अच्छी तरह घूमने के लिए पूरे दो दिन चाहिये। सम्पूर्ण पार्क में घूमने वाली एक ट्रेन, जगह जगह रेस्तोरा और हर जगह श्वेत परिधान और टोपी लगाऐ सेवादार स्वच्छता का लगातार ध्यान रखते हैं।
संस्थान का कहना हैं,
"....पैसा आता रहता है और विकास कार्यों मे खर्च होता रहता है। यह झरने या नदी की तरह कभी न खत्म वाली एक अंतहीन प्रक्रिया है।"
मुख्य मंदिर गाँव में ही है। गजानन भगवान की पारम्परिक स्तूति और पूजा आरती के सिवा संस्थान का किसी तरह का विधी विधान आडंबर नहीं है।
18.12.2018(482km/1053km)
06.45am की आरती में सम्मिलित होने के पश्चात दर्शन और प्रभु का आशीर्वाद ले कर हम 9 बजे बारामती के लिए निकलते हैं, 482km बारामती की ओर इस रास्ते की भी क्या बात करूँ सम्पूर्ण महाराष्ट्र अच्छे रास्ते के लिये माना जाता है। यह अब सम्पूर्ण देश की बात हो चली है। इस रास्ते जगह जगह रेस्टोरेंट है जहाँ झूनका भाकर के बोर्ड लगें है।
9.30 PM हमेशा आनंद और स्नेह से भरे गंधे जी का मकान शहर के आखिरी छोर पर स्थित है। शहरी चिल्ल पौं से दूर. पीछे लगे खेतों से आने वाली ताजी हवा में एक खुशबू है। जो शरीर को एक नई ताजगी से भर देती है। यह शहर बारामती छोटा है, हालाँकि जिला हैं, मगर तेवर बड़े शहरों सा रखता है। समृद्धि जैसे चारों ओर से टपकती है। व्यवसाय और कृषी दोनों जैसे उफान पर है।
19.12.2018(120km/1173km) 11.30AM
दूसरे दिन जैजूरी( 56km) के लिये निकलते हैं।
रास्ते में अष्टविनायक श्री मयूरेश्वर जी के दर्शन करते हुए जैजूरी पहुचते हैं। जैजूरी का मल्हारी मार्तंड मन्दिर एक पहाड़ी पर बना है।
सीढ़ियों पर हल्दी बिखरी हुई है। अभी अभी सदा के लिए अटूट बंधन में बंधे कई जोड़े दर्शन के लिये आतुर हो अपने लिये सुखी जीवन के आशीर्वाद की चाह लिए अपनी धर्मपत्नी को गोद में उठा कर पाँच सीढ़ियाँ चढ़ने की परंपरा निभा रहे हैं। वैसे गृहस्थ आश्रम का बोझ उन्हें जीवन भर उठाना है, मगर इस वक्त वे ताजे ताजे पति बने हैं, सो उत्साह में कुछ ज्यादा ही लबरेज़ हैं, और क्यों न हो सबको अपना एक खूबसूरत मनपसंद जीवन साथी जो मिला है। उनके पैर हल्दी से पीले हुए जा रहे हैं और हृदय उत्साह से। पत्निया प्रसन्न है उन्होंने दमदार जीवन साथी पाया है। एक नए उत्साह से उनका चेहरा दमक रहा है।
मेरे ख्याल में मंदिर परिसर एवं देव को हल्दी चढाने की परम्परा हल्दी के इस गुण की वजह से प्रारम्भ हुई होगी कि यह एक जीवाणु नाशक दवा भी है।
कुछ सीढ़िया चढ़ने के पश्चात मुख्य मंदिर आ जाता है। यह बिल्कुल किसी पुराने किले कि तरह है। चारों ओर से परकोटे से घिरा हुआ, जिस पर चल कर शहर और आसपास के विहंगम दृश्य देखे जा सकते हैं। यहाँ बहुत से लोग “सदानंदा च्या एलकोट” और “जय मल्हार” बोल कर हवा मे हल्दी उड़ा रहें हैं। फर्श का रंगा सुनहरा पीला हो चुका है।
दर्शन के पश्चात मुख्य मंदिर के पीछे चलें तो एक हिस्से मे शिव जी का अभिषेक हो रहा है।
अभिषेक के बगैर कैसी पूजा ? वहाँ कुछ पंडित अभिषेक करवा रहे हैं, हम चारों प्रभु के समीप बैठ जाते हैं और पंडित जी के निर्देशों का पालन करने लगते हैं , उनका तरीका दूसरी जगहों की तरह सोसिफिस्टिकेटेड न हो कर बड़ा ही सीधा सीधा सरल है। वे शिवलिंग पर जल, हल्दी, दही, शहद और चन्दन ले कर जोर जोर से मल देते हैं। जैसे भगवान् से एकात्मता कायम कर रहे हो, जैसे कि एक माँ अपने बच्चे को तेल उबटन कि मालिश करती है और उसके रोने कि कोई चिंता नहीं करती। यहाँ मुझे शिव उसी बच्चे की तरह नज़र आते हैं। तीन लोक के स्वामी अपने भक्तो के स्नेह के इतने कायल हो चुके हैं कि भक्तों द्वारा की गई पूजा सर आँखो पर ले लेते हैं।
शिव जी के लिये भक्तों की श्रद्धा ही महत्वपूर्ण है। बरसो बरस से इसी तरह से पूजा होती आई। पूजा की समाप्ती के दौरान पंडितजी अपने दोनों हाथों में हल्दी ले कर फिर थोड़ा जल ले कर पिंडियो पर मलते हैं और फिर अभिषेक करवा रहें व्यक्ति की पीठ पर जोर से मारते हैं। उनकी पीठ पर पीले पंजे का निशान छप जाता है। भक्तों को शिवजी का यह आशिर्वाद मिला है। मैं भी इसी तरह शिवजी का आशीर्वाद पाने को आतुर हूँ मगर मैने नया कुरता पहना हैं, पंडित जी उस तरह आशीर्वाद नहीं दे पाते जो उन्होंने दूसरे भक्तों को दिया मगर वो मेरे माथे पर दाऐ से बायीं ओर अपनी ऊंगलियो से एक लम्बा आड़ा तिलक कर देते हैं। पूरे माथे को हल्दी चंदन से भर देते हैं। आशीर्वाद मिल चुका है।
मन शिव भक्ति मे सराबोर हो उठता है। होठो पर “सदानंदाच्या ऐलकोट जय मल्हार, हर हर महादेव...” का सतत जाप चल रहा है।
अगले भाग में दमन और अहमदाबाद के पश्चात सूर्य मंदिर और रानी की वाव ...!-
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