ईस्ट कोस्ट रोड...पहला भाग
पहला भाग
विजयवाड़ा से रामेश्वरम
ECR (ईस्टर्न कोस्ट रोड)
वर्षों से मानव यात्रा करता आया है। अलग अलग आयामों में, भिन्न भिन्न स्वरूपों में। आप किसी भी तरह की यात्रा करें कुछ न कुछ पाते जरूर हैं। हमारे आराध्य रामजी ने वनवास को अयोध्या से श्रीलंका एवं वापसी की यात्रा में परिवर्तित करते हुए एक सार्थक दिशा दी।
भारत के कन्याकुमारी में विशाल समुद्र अज़ीम हिंदुस्तान के चरण पखारता है। इस समुद्र का विस्तार पश्चिम में गुजरात और पूर्व में कोलकाता तक है। कोलकाता से कन्याकुमारी तक तट से लगा रास्ता ही ECR यानी ईस्टर्न कोस्ट रोड कहलाता है । ये रास्ते इतने नयनाभिराम हैं कि कुछ तो भारत के शीर्ष दस मनमोहक रास्तों में आते हैं। कारण है समुद्र के तट से लगा होना। समुद्र की नम जलवायु इन स्थानों को हरा भरा रखती है। फिर दूर तक फैले नारियल के पेड़ इसकी शोभा कई गुना बढ़ा देते हैं।
(ऊपर ईस्ट कोस्ट रोड )
मैंने अपने गुजरात ब्लॉग में लखपत बंदरगाह का ज़िक्र किया था । सदियों से समुद्र से लगे इन तटीय क्षेत्रों से विदेशों को सामान आयात निर्यात किया जाता रहा है जो देश की समृद्धि में एक अहम योगदान देते आ रहे हैं, तो दूसरी ओर इन मार्गों पर यात्रा करने वाले पर्यटक मनोहारी दृश्यों के साथ साथ तटीय इलाकों की समृद्धि के भी साक्षी होते हैं।
फिलहाल इस टूर में मेरी रुचि जिन बातों पर थी वे थी, समुद्र तट से लगे मनोहारी प्राकृतिक परिदृश्य और प्राचीन मंदिरों की विरासत से भरी एक अंतहीन श्रृंखला से सीधा संवाद...साक्षात्कार।
दो भागों में लिखे गए ब्लॉग में आप पढ़ेंगे आठ राज्य एवं लगभग छह हजार किलोमीटर की यात्रा का सजीव चित्रण...
विजयवाड़ा से कन्याकुमारी तक अपने पहले भाग की यात्रा में मैंने अंतहीन नयनाभिराम जीवंत दृश्यों को समेटने की कोशिश की है। और तब मैं पाता हूं क्यों भारत अद्वितीय है क्यों इस यात्रा के बगैर भारत को परिभाषित कर पाना या जानना असंभव है, अपूर्ण है।
फरवरी के इस अंतिम सप्ताह में ग्रीष्म ऋतु ने शीत ऋतु को अपना कार्यकाल समेटने का निर्देश दिया लेकिन मैं जानता था ग्रीष्म को अपने पैर पसारने में कुछ वक्त तो लग ही जाएगा और इसके पहले की ग्रीष्म अपने पूरे उरूज पर हो मैं अपनी बहुसंकल्पित यात्रा पूर्ण कर लूँगा।
इस यात्रा में हमारा ध्यान मुख्यत: तीन चीज़ों पर होगा पहला तटीय क्षेत्रों से लगे मनोहारी दृश्य, दूसरे वृहत एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भव्य मंदिर और तीसरे कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित पर्यटन स्थल या कह लीजिए भारत की बहुमूल्य संस्कृति से परिपूर्ण छुपी हुई संपदा का एक्सप्लोरेशन...
1 मार्च : सुबह के छह बजे : जबलपुर से नागपुर के लिए निकलते हैं। मौसम साफ है।मैंने अपनी कार का मीटर शून्य पर कर दिया।
सुबह के साढ़े ग्यारह बजे नागपुर : यह भीमराव अम्बेडकर एयर पोर्ट है। मैनचेस्टर के लिए परितोष की फ्लाइट दोपहर को है। कुछ वक्त एयरपोर्ट पर उसके साथ और बिताने के बाद हमने हैदराबाद की राह पकड़ी।
हैदराबाद रात दस बजे : एक होटल में ठहरते हैं।
2 मार्च सुबह आठ बजे : विजयवाड़ा की दूरी 277 कि.मी. है। इसे हम छह घंटों में पूर्ण करेंगे।
दो घंटे में एक मंदिर दृष्टव्य होता है। मंदिर छोटा है किंतु सुंदर है। किसी देवी का है। पीछे एक तालाब भी है। तो जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ,
'रास्ता ही मंजिल है', तो रास्ते में आपको वह सब कुछ मिलता है जो आपके कार्यक्रम में नहीं होता।
दोपहर के दो बजे हैं। यह एक बड़ा शहर है। यह विजयवाड़ा है। हॉटल एस.के. रिवर फ्रंट के ठीक सामने कृष्णा नदी बह रही है। जिस पर 150 वर्ष पुराना प्रकासम बैराज बना है, जो तंगुतुरी प्रकासम के नाम पर है, तो यहीं ठहरते हैं।
शाम छह बजे नगर दर्शन के लिए निकलते हैं। विजयवाड़ा दुनियां का सबसे घनी आबादी वाला शहर है। बाज़ार चहल पहल से भरे हैं। शाम के सात बजे हैं ऑफिस से घर लौटने वालों ने ट्रैफ़िक को लगभग जाम ही का दिया है। रास्तों से सटे फुटपाथ पर मालिनें सुगंधित फूलों से बनाई वेणियां बेच रहीं हैं। संपूर्ण दक्षिण में महिलाएं वेणियां लगा कर मंदिरों में दर्शन करती हैं। उनका यह भाव भगवान को अल्लाहदित करता है।
रात के दस बजे हैं। होटल का खाना अच्छा है। कल सुबह मंदिर दर्शन के लिए निकलेंगे।
3 मार्च 2026, सुबह 4 बजे :
मंदिर में सामान्य भीड़ है। दर्शन के लिए कोई समस्या नहीं। गोपुरम (स्वागत द्वार) की वास्तुकला बस देखते ही बनती है। यह तो बस शुरुआत है। दक्षिण के सभी मंदिरों में ये स्वागत द्वार (गोपुरम) मंदिरों से भी सुंदर बनाए गए हैं।
एक रेस्तरां नज़र आता है जिसे बढ़िया तो नहीं कह सकते किन्तु ब्रेकफास्ट का समय निकला जा रहा है सो यहीं रुकते हैं। आगे वेल्लोर 522 कि.मी. और लगने वाला समय है, 9 घंटे ।
शाम पांच बजे, वेल्लोर पहुंच कर हमने हॉटल स्ट्रॉबेरी फ्रेस्टो में चेक इन कर लिया है, जो रास्ते पर ही है। वेल्लोर मेरी लिस्ट में नहीं था। मैं ECR नहीं छोड़ना चाहता था। किंतु श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका और वेल्लोर को ट्रिप में शामिल कर लिया किन्तु चिंता की कोई बात नहीं आगे मैं कांचीपुरम होते हुए महाबलीपुरम पहुंचूंगा और पुनः ECR ज्वाइन कर लूंगा।
4 मार्च सुबह आठ बजे : श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल...वेल्लोर
इतिहास के अनुसार वेल्लोर के पास श्रीपुरम में इस स्वर्ण मंदिर का निर्माण मात्र सात वर्षों में 24 अगस्त 2007 को पूर्ण हुआ। यह स्वर्ण मंदिर हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। पूरे मंदिर पर सोने की पन्नी की 9 से 15 परतें चढ़ाई गई हैं। वेल्लोर स्थित श्री नारायणी पीठम ने इस मंदिर का डिज़ाइन तैयार किया। सोने से ढके माथे पर चांदी की जटिल नक्काशी और कलाकृतियां हैं। प्रकाश व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि शाम के समय भी माथा जगमगाता रहता है। मुकुट 1500 किलोग्राम से अधिक सोने से बना है। इसमें बारीकियों का विशेष ध्यान रखा गया है। चालीस किलो चांदी की श्री गणेशजी की प्रतिमा बरबस ही ध्यान आकर्षित कर लेती है।
वेल्लोर फोर्ट :
श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल से लौटते हुए नज़र आता है, वेल्लोर फोर्ट और इसके भीतर ही है एक छुपा हुआ खजाना जो है अद्भुत वास्तुकला और पत्थरों पर उकेरी नक्काशी वाला जलकंडेश्वर मंदिर, जिसका निर्माण 16वीं शताब्दी (लगभग 1550 ईस्वी) में विजयनगर साम्राज्य के दौरान, सदाशिवराय के एक अधीनस्थ, चिन्ना बोम्मी नायक द्वारा किया गया था। यह मंदिर वास्तुकला की विजयनगर शैली में बना है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं को पत्थरों पर उकेर कर जैसे भारतीय संस्कृति को अजर अमर बना दिया गया हो। दक्षिण भारत के कई प्राचीन मंदिर इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे एकमात्र प्रमाण है प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के, हमारी विरासत और हमारे देश पर अपने अधिकार के।
इन सबमें जो खास बात पर मैंने गौर किया है, वह है दक्षिण भारत की समृद्ध संस्कृति जो ईश के प्रति महान भाव को प्रगट करती है और वह है, सभी मंदिरों में अभी भी वही प्राचीन रीति रिवाजों से जारी पूजा अर्चन का निर्बाध क्रम।
सुबह के ग्यारह बजे हैं। अब आगे सिर्फ एक घंटे की ही दूरी पर तो है...
हज़ार मंदिरों वाला शहर कांचीपुरम :
कांचीपुरम न केवल कांचीवरम साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है बल्कि कभी यहां हजार से अधिक मंदिर हुआ करते थे जो पल्लव डायनेस्टी की आस्था को उजागर करते हैं और दांतों तले उंगलियां दबा लेने को मज़बूर भी। वक्त के थपेड़ों से बचे लगभग 150 मंदिर अभी भी बेहतर हालात में हैं जिनमें बहुत से सक्रिय हैं।
फिलहाल पतली संकरी गलियों में ऑटो से घूमना ज्यादा सुविधाजनक लगा। तो एक ऑटो किया और चल पड़े।
एकम्भरनाथर मंदिर:
का स्वरूप अद्भुत है। मैंने सम्पूर्ण देश में इतने वृहत आकार के मंदिर नहीं देखे। आश्चर्य की बात है इन भव्य मंदिरों का निर्माण करने वाली डायनेस्टी (साम्राज्य ) के महल या किले कहीं दृष्टव्य नहीं होते । शायद वे कहना चाह रहे हों, ईश्वर के आवास के सम्मुख अपने महलों का निर्माण ईश्वर की शान में गुस्ताख़ी हो सकता है। शायद वे यह भी चाहते हों लोग उनके महल नहीं बल्कि मंदिरों में विराजमान देव के सम्मुख नतमस्तक हो, वे देव जिन्हें इतनी भव्यता के साथ स्थापित करना सर्वथा न्यायोचित है। उस वक्त जबकि राजस्थान अपने मज़बूत किलों और महलों के लिए जाना जाता है, भारत का यह दक्षिणी भाग अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।
इनका निर्माण करने वाले शायद जानते थे आने वाले वर्षों में शहर का विस्तार मंदिर को निगल जाएगा। इस हेतु उन्होंने प्रायः सभी मंदिरों में चार या कहीं कहीं पांच परकोटे यानी चहारदिवारी का निर्माण किया। इस तरह मुख्य गर्भ गृह में विराजे महादेव बग़ैर किसी शोरगुल के अपनी अक्षुण्ण शांति भरे वातावरण में वास करते हैं।
























































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