ईस्ट कोस्ट रोड...पहला भाग

विजयवाड़ा से रामेश्वरम

ECR (ईस्टर्न कोस्ट रोड)

( पहला भाग)


वर्षों से मानव यात्रा करता आया है। अलग अलग आयामों में, भिन्न भिन्न स्वरूपों में। आप किसी भी तरह की यात्रा करें कुछ न कुछ पाते जरूर हैं। हमारे आराध्य रामजी ने श्रीलंका एवं वापसी की यात्रा करते हुए वनवास को एक सार्थक दिशा दी।

भारत के कन्याकुमारी में विशाल समुद्र अज़ीम हिंदुस्तान के चरण पखारता है। इस समुद्र का विस्तार पश्चिम में गुजरात और पूर्व में कोलकाता तक है। कोलकाता से कन्याकुमारी तक तट से लगा रास्ता ही ECR यानी ईस्टर्न कोस्ट रोड कहलाता है । ये रास्ते इतने नयनाभिराम हैं कि कुछ तो भारत के शीर्ष दस मनमोहक में आते हैं। कारण है समुद्र के तट से लगा होना। समुद्र की नम जलवायु इन स्थानों को हरा भरा रखती है। फिर दूर दूर तक फैले नारियल के पेड़ इसकी शोभा कई गुना बढ़ा देते हैं।


(ऊपर ईस्ट कोस्ट रोड )
(नीचे वेस्ट कोस्ट रोड )

मैंने अपने गुजरात ब्लॉग में लखपत बंदरगाह का ज़िक्र किया था । सदियों से समुद्र से लगे तटीय क्षेत्रों से विदेशों को सामान आयात निर्यात किया जाता रहा है। ये देश की समृद्धि में एक अहम योगदान देते आ रहे हैं, तो दूसरी ओर इन मार्गों पर यात्रा करने वाले पर्यटक मनोहारी दृश्यों के साथ साथ तटीय इलाकों की समृद्धि के भी साक्षी होते हैं। 

फिलहाल इस सफ़र में मेरी रुचि जिन बातों पर थी वे थी, समुद्र तट से लगे मनोहारी प्राकृतिक परिदृश्य और मंदिरों के रूप में प्राचीन विरासत से भरी एक अंतहीन श्रृंखला से सीधा संवाद...साक्षात्कार। इसे मैंने दो भागों में लिखा है।

फरवरी के अंतिम सप्ताह में ग्रीष्म ऋतु ने शीत ऋतु को अपना कार्यकाल समेटने का निर्देश दिया लेकिन मैं जानता था ग्रीष्म को अपने पैर पसारने में कुछ वक्त तो लग ही जाएगा और इसके पहले की ग्रीष्म अपने पूरे उरूज पर हो मैं  अपनी बहुसंकल्पित यात्रा पूर्ण कर लूँगा।

विजयवाड़ा से कन्याकुमारी तक अपने पहले भाग की यात्रा में मैंने नयनाभिराम जीवंत दृश्यों को समेटने की कोशिश की है और तब पाता हूं क्यों भारत अद्वितीय है, क्यों इस यात्रा के बगैर भारत को परिभाषित कर पाना या जानना असंभव है, अपूर्ण है।

तो आइए करते हैं भारत की बहुमूल्य संस्कृति से परिपूर्ण छुपी हुई संपदा का एक्सप्लोरेशन...

2 मार्च सुबह दस बजे : विजयवाड़ा की ओर जाते हुए रास्ते में एक मंदिर दृष्टव्य होता है। मंदिर छोटा है किंतु सुंदर है। यहां आसपास कोई नहीं जिससे इस मंदिर के संबंध में और जानकारी मिल सके लेकिन यह हैदराबाद से 68 किलोमीटर दूर श्री शैलम के रास्ते पर  मिसिगुंडी पर स्थित मसम्मा देवी के मंदिर से काफ़ी मिलता है। ध्यान से देखने पर पशु बलि के स्पष्ट निशान भी  हैं, जो कल दी गई होगी। मंदिर की कलाकृति से अंदेशा है यह देवी का मंदिर है, जो बंजारा जाति की दृढ़ आराध्या हैं और संभवतः इस मंदिर को भी बंजारा जाति ने ही बनाया होगा। कुछ भी हो यह स्थल मनमोहक है। पीछे लगे तालाब और उस पर उगे पेड़ों ने इसे किसी कैनवास पर उकेरी पेंटिंग जैसा बना दिया है। तो जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ,

'रास्ता ही मंजिल है', तो आपको वह सब  मिलता है जो आपके कार्यक्रम में नहीं होता।

शाम के चार बजे : यह विजयवाड़ा है,  25 लाख की आबादी वाला एक बड़ा शहर। हमारे हॉटल एस.के. रिवर फ्रंट के ठीक सामने कृष्णा नदी बह रही है। जिस पर 150 वर्ष पुराना प्रकासम बैराज बना है, जो तंगुतुरी प्रकासम के नाम पर है। दरअसल यह ओल्ड विजयवाड़ा है। यहीं से शहर की धड़कन स्पष्ट सुनाई देगी। तो यहीं ठहरते हैं।

शाम सात बजे हैं। दुनियां की सबसे घनी आबादी वाले इस शहर के दर्शन को चलते हैं। बाज़ार चहल पहल से भरे हैं। ऑफिस से घर लौटने वालों ने ट्रैफ़िक लगभग जाम ही का दिया है। रास्तों से सटे फुटपाथ पर मालिनें सुगंधित फूलों से बनी वेणियां बेच रहीं हैं। संपूर्ण दक्षिण में महिलाएं वेणियां लगा कर मंदिरों में दर्शन करती हैं। उनका यह भाव भगवान को अल्लाहदित करता है।

आगे चलने पर एक रेस्तरां जैसा कुछ नज़र आता है। वहां बहुत भीड़ है। उत्सुकतावश हम वहां पहुंचते हैं।

एक व्यक्ति ने बताया, यह व्यवस्था गरीबों, दिहाड़ी मजदूरों के लिए रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध कराने वाली सरकारी पार्टी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की ओर से है। ये स्थायी स्टॉल, जिन्हें अन्ना कैंटीन के नाम से जाना जाता है, मात्र ₹5 प्रति व्यक्ति की दर पर नाश्ता, दोपहर और रात का खाना परोसते हैं जो मूल रूप से मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा शुरू की गई थी। मध्यप्रदेश में भी सरकार मुफ़्त राशन उपलब्ध करवा रही है किन्तु अन्ना कैंटीन का कॉन्सेप्ट बेहतर है। जो सीधे सीधे जरूरतमंद को लाभ पंहुचाता है।

रात के दस बजे: हॉटल में नीचे ही रेस्तरां है। रात का खाना अच्छा है। कल सुबह मंदिर दर्शन के लिए निकलेंगे।

3 मार्च 2026, सुबह 4 बजे : 

मंदिर में सामान्य भीड़ है। दर्शन के लिए कोई समस्या नहीं। गोपुरम (स्वागत द्वार) की वास्तुकला बस देखते ही बनती है। यह तो बस शुरुआत है। दक्षिण के सभी मंदिरों में ये स्वागत द्वार (गोपुरम) मंदिरों से भी सुंदर और ऊँचे बनाए गए हैं।




आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में कृष्णा नदी के तट पर स्थित कनक दुर्गा मंदिर (श्री दुर्गा मल्लेश्वर स्वामीवरला देवस्थानम) एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्राचीन हिंदू मंदिर है। मंदिर पौराणिक महत्व रखता है। मंदिर के बाहर दुनिया कहीं से कहीं जा चुकी है किंतु भीतर वक्त ठहर चुका है। उस वक्त जब मंदिर का निर्माण हुआ था यानी बारह सौ वर्ष पहले चालुक्य राजवंश द्वारा जो पूजा पद्धति अपनाई गई थी उसमें लेश मात्र भी परिवर्तन नहीं किया गया है, जो इतनी प्रभावशाली है कि चंचल से चंचल मन भी एक पल के लिए ठहर जाए। हवा में दियों के तेल के जलने की गंध धूप की खुशबू में मिलकर कभी न भूलने वाली एक स्मृति बना देती है।  

ऋषि कीला ने इंद्र की देवी दुर्गा के दर्शन पाने के लिए यहाँ घोर तपस्या की थी, जिसके बाद देवी यहाँ 'कनक दुर्गा' के रूप में प्रकट हुईं। कहते हैं, पर्वत पर स्थित मंदिर में इंद्रदेव मां दुर्गा के दर्शन को आते हैं, इसलिए इस पर्वत का नाम इंद्रकिलाद्रि पड़ गया। यह एक स्वयंभू (स्वयं प्रकट) शक्तिपीठ है, जहाँ देवी दुर्गा स्वर्ण रूप में विराजमान हैं। किंवदंतियों के अनुसार अर्जुन ने यहाँ भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी और माता दुर्गा के सम्मान में इस मंदिर का निर्माण करवाया था। आदि गुरु शंकराचार्य ने भी यहाँ श्रीचक्र स्थापित किया था। बाद में आने वाले राजवंशों द्वारा लगातार इसका जीर्णोद्धार करवाया जाता रहा है।


सुबह के दस बजे हैं । दर्शन के पश्चात अब 1500 से 1660 वर्ष पुरानी उंडावल्ली गुफाएं देखते हुए वेल्लोर के लिए निकलते हैं। ये गुफाएँ विष्णुकुण्डिना राजवंश द्वारा निर्मित एवं बाद के वर्षों में चालुक्य और  रेड्डी राजवंशों द्वारा संरक्षित की जाती रहीं हैं।

एक रेस्तरां नज़र आता है जिसे बढ़िया तो नहीं कह सकते किन्तु समय निकला जा रहा है सो यहीं रुकते हैं।

वेल्लोर पहुंच कर हमने हॉटल स्ट्रॉबेरी फ्रेस्टो में चेक इन कर लिया है, जो रास्ते पर ही है। वेल्लोर मेरी लिस्ट में नहीं था। मैं ECR नहीं छोड़ना चाहता था। किंतु श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका और वेल्लोर को ट्रिप में शामिल कर लिया। चिंता की कोई बात नहीं आगे मैं कांचीपुरम होते हुए महाबलीपुरम पहुंचूंगा और पुनः ECR ज्वाइन कर लूंगा।

शाम का वक्त है सूर्य देव अपना सफ़र तय कर अब अस्त होने को हैं। मैंने अपना कैमरा निकाल लिया है...

4 मार्च सुबह आठ बजे : श्रीलक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल... वेल्लोर 


भारत कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था, न केवल वेल्लोर बल्कि संपूर्ण भारत के कई मंदिरों जैसे अमृतसर का स्वर्ण मंदिर या सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के गर्भ गृह में बहुतायत से मढ़ा स्वर्ण इस बात का प्रमाण है कि आज भी भारत सोने की चिड़िया ही है।



मंदिर के बाहरी भाग में सोने की पन्नी की 9 से 15 परतें चढ़ाई गई हैं। वेल्लोर के पास श्रीपुरम में इस स्वर्ण मंदिर का निर्माण मात्र सात वर्षों में 24 अगस्त 2007 को पूर्ण हुआ। यह स्वर्ण मंदिर हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। श्री नारायणी पीठम ने इस मंदिर का डिज़ाइन तैयार किया। सोने से ढके माथे पर चांदी की जटिल नक्काशी और कलाकृतियां हैं। प्रकाश व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि शाम के समय भी माथा जगमगाता रहता है। मुकुट 1500 किलोग्राम से अधिक सोने से बना है। इसमें बारीकियों का विशेष ध्यान रखा गया है। चालीस किलो चांदी की श्री गणेशजी की प्रतिमा बरबस ही ध्यान आकर्षित कर लेती है।


वेल्लोर फोर्ट :


श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल से लौटते हुए नज़र आता है, वेल्लोर फोर्ट और इसके भीतर ही है एक छुपा हुआ खजाना जो है अद्भुत वास्तुकला और पत्थरों पर उकेरी नक्काशी वाला जलकंडेश्वर मंदिर, जिसका निर्माण 16वीं शताब्दी (लगभग 1550 ईस्वी) में विजयनगर साम्राज्य के दौरान, सदाशिवराय के एक अधीनस्थ, चिन्ना बोम्मी नायक द्वारा किया गया था। यह मंदिर वास्तुकला की विजयनगर शैली में बना है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं को पत्थरों पर उकेर कर जैसे भारतीय संस्कृति को अजर अमर बना दिया गया हो। दक्षिण भारत के कई प्राचीन मंदिर इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे एकमात्र प्रमाण है प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के, हमारी विरासत और हमारे देश पर अपने अधिकार के।

इन सबमें जो खास बात पर मैंने गौर किया है, वह है दक्षिण भारत की समृद्ध संस्कृति जो ईश के प्रति महान भाव प्रगट करती है और वह है सभी मंदिरों में अभी भी वही प्राचीन रीति रिवाजों से जारी पूजा अर्चन का निर्बाध क्रम।



( ऊपर जलकंडेश्वर मंदिर )






सुबह के ग्यारह बजे हैं। अब आगे सिर्फ एक घंटे की दूरी पर ही तो है...

हज़ार मंदिरों वाला शहर कांचीपुरम : 

कांचीपुरम न केवल  कांजीवरम साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है बल्कि कभी यहां हजार से अधिक मंदिर हुआ करते थे जो पल्लव डायनेस्टी की आस्था को उजागर करते हैं और दांतों तले उंगलियां दबा लेने को मज़बूर भी। वक्त के थपेड़ों से बचे लगभग 150 मंदिर अभी भी बेहतर हालात में हैं जिनमें बहुत से सक्रिय भी हैं।

फिलहाल पतली संकरी गलियों में ऑटो से घूमना ज्यादा सुविधाजनक लगा। तो एक ऑटो किया और चल पड़े।

एकम्भरनाथर मंदिर: 

का स्वरूप अद्भुत है। मैंने सम्पूर्ण देश में इतने वृहत आकार के मंदिर नहीं देखे। आश्चर्य की बात है इन भव्य मंदिरों का निर्माण करने वाली डायनेस्टी (साम्राज्य ) के महल या किले कहीं दृष्टव्य नहीं होते । शायद वे कहना चाह रहे हों, ईश्वर के आवास के सम्मुख अपने महलों का निर्माण ईश्वर की शान में गुस्ताख़ी हो सकता है। शायद वे यह भी चाहते हों लोग उनके महल नहीं बल्कि मंदिरों में विराजमान देव के सम्मुख नतमस्तक हो, वे देव जिन्हें इतनी भव्यता के साथ स्थापित करना सर्वथा न्यायोचित है। उस वक्त जबकि राजस्थान अपने मज़बूत किलों और महलों के लिए जाना जाता है, भारत का यह दक्षिणी भाग अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।

इनका निर्माण करने वाले शायद जानते थे आने वाले वर्षों में शहर का विस्तार मंदिर को निगल जाएगा। इस हेतु उन्होंने प्रायः सभी मंदिरों में तीन या चार परकोटे यानी चहारदिवारी का निर्माण किया। इस तरह मुख्य गर्भ गृह में विराजे ईश्वर बग़ैर किसी शोरगुल के अपनी अक्षुण्ण शांति भरे वातावरण में वास करते हैं।


 (ऊपर मंदिर का विहंगम दृश्य विक्किपीडिया से साभार )

                             





कमाक्षी अम्मा मंदिर:

सन्नाथी स्ट्रीट पर स्थित एवं आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित अद्वितीय श्री चक्र के लिए प्रसिद्ध कमाक्षी अम्मा का मंदिर इंकावन शक्ति पीठों में एक है। 

इसके पश्चात वरदराज पेरुमल विष्णु एवं कैलाशनाथ मंदिर पल्लव वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है। 

कांचीपुरम जा कर साड़ियां न खरीदना वैसा ही है जैसे किसी समुद्र तट पर लहरों को छुए और अपने पैर भिगोये बगैर लौट आना तो साड़ियों के कुछ शोरूम की ओर रुख करते हैं।

अब आगे हम हैं महाबलीपुरम के रास्ते पर। दूरी है 70 किलोमीटर और लगने वाला समय है 1 घंटे चालीस मिनट...

चार मार्च रात के नौ बजे हैं जैसा कि मैंने प्लान किया था, मैं  महाबलीपुरम में E C R ज्वाइन कर लूंगा। और वही हुआ। "हॉटल पेंडियम रेजीडेंसी महाबलीपुरम" अगले दो दिन के लिए हमारा ठिकाना होगा। तो इस अति प्राचीन शहर को एक्सप्लोर करते हुए हम छह मार्च की सुबह आगे का सफर जारी रखेंगे।

5 मार्च सुबह 9 बजे: 



1984 में महाबलीपुरम में स्थित गंगा का अवतरण ( अर्जुन की तपस्या ) स्मारकों के एक समूह को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्ज़ा मिला। 








ये स्मारक सातवीं शताब्दी में पल्लव राजवंश द्वारा पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृति के लिए प्रसिद्ध है। यहां विदेशी बहुतायत से हैं। वे चारों ओर हैं। हमारे देश को जानने की उनकी जिज्ञासा चरम पर है। वे बड़े ही ध्यान से अपने गाइड की बातें सुन रहे हैं।

तभी वहां खड़े एक व्यक्ति ने कुछ किताबें ऑफर की जो हिंदी अंग्रेजी और कुछ अन्य भाषाओं में थी।

"हमें इन किताबों को ले लेना चाहिए। जानकारियों के बगैर तो यह सब पत्थर ही हैं।"


इस स्थल को छह भागों में बाटा गया है। इस किताब से मुझे वहां का इतिहास समझना आसान हो गया।


( ऊपर जबलपुर की बैलेंसिंग रॉक की ही तरह ढाल पर संतुलित 'कृष्ण की बटर बॉल' )

"आपके हाथों में जो किताब है वह मैंने लिखी है। मैं जे. प्रभाकर हूं ।" एक सज्जन जिनकी उम्र सत्तर के आस पास होगी, ने मेरे हाथों में किताब देख कर मुझसे कहा।


"ओह ! आपसे मिल कर खुशी हुई।" मैंने उनके साथ एक स्नेप लिया। कुछ देर बात करने के दौरान उन्होंने बताया वे भारतीय पुरातत्व विभाग से सेवानिवृत निदेशक हैं और फिलहाल अपने कुछ विदेशी मित्रों को महाबलीपुरम घुमाने लाये हैं।

इसके पश्चात हम आगे प्रकाश स्तंभ तक चले आए। यहां हमें मिलता है एक अनोखा शख्श जो गुजरात से आया था। बातों ही बातों में उसने बताया,

"मैं गुजरात से सायकल से चला था और WCR पूरा कर चुका हूं और अब आगे ECR पर चलते हुए कोलकाता तक जाऊँगा।" 

"और हम WCR पर चलते हुए गोकर्ण तक जाएंगे फिर घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर।"

पूछने पर उसने बताया, " मैं इंजीनियर हूं एक कंपनी में काम करता हूं, जब भी समय मिलता है यात्रा के लिए निकल पड़ता हूँ। सायकल से दो हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुका हूं और अब आगे विशाखापत्तनम जाऊँगा। "

ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक चमक आ गई जो  रेत में सोना ढूंढ़ने वालों के मुख पर अमूमन उस वक्त आ जाती है जब उन्हें सोने के बारीक टुकड़े मिल जाते हैं।

हम कुछ देर बातें करते रहे फिर उसने मुस्कुरा कर अभिवादन करते हुए अपने कदम आगे बढ़ा लिए। हम लोग एक चट्टान पर बैठ गए ।

"एक फोटों खिंचवाएंगे सर ?"

गले में कैमरा लटकाए ग्राहकों की खोज में घूम रहे एक फोटोग्राफर ने पूछा। मैंने हां की मुद्रा में सर हिलाया।  



आगे एक अनोखी कलाकृति है। पांच पांडव के पांच रथ या पंच रथ। चट्टानों की एक वृहत श्रृंखला को काट कर रथ की शक्ल दे दी गई है... अद्भुत...



पंच रथ के पास ही कुछ दुकानों में कलाकार पत्थर तराश कर ईश्वर की मूर्तियां बनाते नजर आते हैं। ये मूर्तियाँ / स्कल्पचर देश के विभिन्न हिस्सों में भेजे जाते हैं, किसी मंदिर, पार्क, हॉटल आदि के पूजा गृह के लिए।

लंच का वक्त हो चला था। लंच में रोटी का मिल जाना एक सुखद अनुभूति है। मैंने गौर किया कुछ वर्ष पूर्व उत्तर भारतीय भोजन इतनी आसानी से नहीं मिलता था।

शाम 5 बजे : शोर टेम्पल:

आठवीं शताब्दी में पल्लव डायनेस्टी के राजसिमहमा द्वारा ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित शोर टेम्पल को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्ज़ा मिला है। इसके कुछ भाग एक लंबे काल खंड के दौरान समुद्र में समा गए थे जिसके भग्नावेश बाद में निकाल कर परिसर में जमा दिए गए हैं।

मंदिर में कुल तीन गर्भ हैं। बीच वाले गर्भ गृह में लेटे हुए विष्णु हैं, बाकी दोनों में शिव हैं। मंदिर के पीछे ही समुद्र है। शोर मचाती लहरों को देख कर ऐसा महसूस होता है जैसे वे ब्रह्माण्ड के स्वामी के पैर पखारने की कोशिश कर रही हो।




शोर टेम्पल देखने के बाद टहलते हुए हम  मामल्लापुरम में समुद्र के किनारे 44 - 45 एकड़ में फैले रेडिसन ब्ल्यू रिज़ॉर्ट्स तक आ गए। ऑलिव रिज़ॉर्ट रिडले कछुओं के संरक्षण में इस तरह संकल्पित है कि इसे मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट ने भी मान्यता दी है। साथ ही इसे दुनिया का सबसे बड़ा घुमावदार स्विमिंग पूल का श्रेय भी प्राप्त है। इनके पास अपना समुद्र तट है जो अतिथियों को समर्पित है, खासकर उनके विदेशी  अतिथियों को। रात के आठ बजे हैं। फ्लड लाइटों की तेज़ रोशनी में समुद्र की लहरों को स्पष्ट देखा जा सकता है। यहां कतार से विदेशी बैठे हैं। यहां का रेस्टोरेंट उनके सफ़र की थकान उतारने के लिए एक अच्छा विकल्प है। समुद्र की ठंडी हवाओं के बीच लज़ीज़ व्यंजनों का लुत्फ भी लिया जा सकता है...बेशक ठण्डी बीयर के साथ।

छह मार्च सुबह प्रतिदिन की तरह नींद सुबह जल्द खुलती है। सूर्योदय का समय सवा पांच के आसपास होगा अभी साढ़े चार बजे हैं लेकिन मैं पैदल ही निकल चुका था...समुद्र पास ही है। जब भी आप किसी ऐसी जगह जायें तो उसे सुबह शाम और रात इन प्रहरों में देखें। हर बार एक नए रूप से अवगत होंगे।

मैं समुद्र तट पर पहुंच चुका हूँ। सुबह के पांच बजने को हैं। इस वक्त भीड़ बढ़ने लगी है। हर कोई प्रकृति के इस खजाने को लूटना चाहता है। कुछ ही देर में सूर्योदय होगा।  हम कल शाम भी यहां आए थे लेकिन इस वक़्त नज़ारा कुछ और है। बेशक़ मेरे कैमरे को कुछ बढ़िया दृश्य मिल जाते हैं। 


सुबह सवेरे सूर्योदय का अभूतपूर्व दृश्य याने प्रकृति के साथ एकात्म स्थापित करना या जैसे ईश्वर के साथ तारतम्य बैठाने जैसा है। यह प्रकृति का वह उपहार है जो बिल्कुल मुफ्त मिलता है एवं एक अंतहीन सुकून एवं ऊर्जा से भर देता है और इसके लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं होती। आपको यह उपहार प्राप्त होता है अपने घर की छत, लॉन या मैदान में...बस ज़रा जल्द उठने की ज़हमत करनी होती है फिर कुछ ही दिनों में आप इसके एडिक्टेड हो जाते हैं ।
 
समुद्र पूरी दुनियां में लोगों के आखेट, समय व्यतीत करने और मन रमाने की जगहों में शुमार हो चुका है। अनथक लगातार किनारे तक आने वाली लहरें इसे जीवंत रखती है। ये लहरें लोगों के दिलों में एक उत्साह जगाती। 



सूर्य किरणों ने अभी अभी समुद्र को छुआ है और जल को स्वर्णिम आभा से भर दिया है। यह अभूतपूर्व है। यहां आना सफल हुआ।



सुबह के दस बजने को है। महाबलीपुरम से विदा लेते हुए तंजावुर के लिए निकलते हैं जहां आज रात्रि विश्राम करेंगे लेकिन रास्ते में ( 3 घंटे की दूरी पर ) स्थित पिचावरम मैंनग्रूव भी घूमा जा सकता है, जो विश्व का दूसरा बड़ा मेनग्रूव फोरेस्ट है। यह 11 हेक्टेयर में फैला है। आप पांच सौ रुपए में बोट बुक कर एक घंटा घूम सकते हैं। यह भी मेरी लिस्ट में नहीं था वह तो यूही इंटरनेट खंगालते हुए मेरी आँखों के सामने आ गया।






पिचावरम मैंनग्रूव प्रकृति की अद्भुत बनावट है। यह आश्चर्यजनक है।

यहीं पास में महादेव की नटराज रूप में एक सौ आठ प्रतिमाओं से सज्जित नटराज मंदिर भी है। दोपहर को मंदिर बंद होने की वजह से हम भीतर प्रवेश न कर सके। दक्षिण के मंदिर अपनी कड़ी व्यवस्था, गहन पूजा अर्चना और समय के सख्त पाबंद हैं ड्रेस कोड के भी अतः कृपया ध्यान रखें ।

पिचावरम मैंनग्रूव घूम कर अब तंजावुर की और रुख करते हैं। तंजावुर से 71 किलोमीटर पहले गंगईकोंडा चोलपुरम (अरियलूर जिला) में स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर महादेव को समर्पित बृहदेश्वर मंदिर एक छुपे खजाने की तरह सम्मुख आ जाता है। अस्सी टन वजनी एक पत्थर से नंदी महाराज को उकेरा गया है। गर्भ गृह में शिवलिंग 29 फीट ऊँचा और 20 टन वजनी है। मंदिर का परिमाप उपलब्ध नहीं है किन्तु यह भारत के विशाल मंदिरों में से एक है । इसका प्रवेश द्वार यानी  गोपुरम ही 192 -194  फ़ीट ऊँचा है  इसके भीतर 1000  स्तम्भों का हॉल है। 





मंदिर के भीतर फोटो लेना वर्जित है। लंच का समय हो चला है। पास में एक होटल है। बहुत भीड़ है। अपनी सीट पर बैठते ही परोसगारी करने वाले ने तेजी से पत्तल और दोने लगा दिये। फिर उसने उसी यंत्रवत मुद्रा में चावल, दाल, दही, सब्जी और चटनी परोस दी। सभी लोग हाथ से खाना खा रहे हैं। यहां कोई संकोच नहीं है। हमने भी वैसे ही खाना शुरू कर दिया जो उम्मीद से ज्यादा स्वादिष्ट था।

शाम सात बजे तंजावुर : होटल la orchid में कोई राजनीतिक कार्यक्रम है शायद। कोई सौ देढ़ सौ कार्यकर्ता होंगे। सभी ने सफेद लूँगी और सफ़ेद शर्ट पहनी है जैसे उनका कोई पूर्ण निर्धारित ड्रेस कोड हो। खैर कमरा आसानी से मिल जाता है।

7 मार्च सुबह के 8 बजे : शहर के मध्य कावेरी नदी के किनारे स्थित बृहदेश्वर मंदिर के दर्शन को निकलते हैं तो पाते है यह तो  गंगईकोंडा चोलपुरम (अरियलूर जिला) में स्थित बृहदेश्वर मंदिर की फोटो कॉपी है, जिसे हमने कल शाम देखा था । खैर जब गूगल किया तो अंतर  स्पष्ट हो जाता है।

यह इतना महत्वपूर्ण है कि मैं चाहता हूँ आप स्वयं गूगल कर दोनों मंदिरों की जानकारी प्राप्त कर अपनी अगली दक्षिण यात्रा में शामिल करें और जाने हिंदुस्तान का इतिहास कितना समृद्धशाली रहा है । दुःख होता है स्कूलों में पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रम पर, देश का बच्चा बच्चा ताजमहल के बारे में जानता हैं किन्तु एक दुरूह निर्माण प्रक्रिया से गुज़रे और भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत इन मंदिरों के बारे में अनभिज्ञ है ।

(फिर भी आपकी सुविधा के लिए इंटरनेट से प्राप्त जानकारी साझा कर रहा हूँ। )  
 
तंजावुर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर और गंगईकोंडा चोलपुरम (अरियलूर जिला) में स्थित बृहदीश्वर मंदिर मुख्य रूप से अपने निर्माताओं, आयु, आकार और स्थापत्य कला की बारीकियों में भिन्न हैं , हालांकि दोनों ही चोल राजवंश द्वारा निर्मित द्रविड़ वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं। मुख्य अंतर निर्माता और काल: तंजावुर मंदिर का निर्माण राजाराजा चोल प्रथम द्वारा करवाया गया था और यह लगभग 1010 ईस्वी में पूरा हुआ था। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर का निर्माण उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथमद्वारा करवाया गया था और यह उनकी नई राजधानी के हिस्से के रूप में 1035 ईस्वी में पूरा हुआ था। आकार और भव्यता: तंजावुर मंदिर आकार में बड़ा है और इसमें लगभग 66 मीटर ऊँचा विश्व के सबसे ऊँचे विमानों (मंदिर के शिखर) में से एक है। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर आकार में थोड़ा छोटा है और इसके प्रांगण का ले आउट अधिक सघन है। इसका सूक्ष्म रूप से घुमावदार (अंदर की ओर धंसा हुआ) शिखर इसे तंजावुर के शिखर की मर्दाना सीधी रेखाओं की तुलना में अधिक स्त्रीत्वपूर्ण या सुंदर रूप प्रदान करता है।कलात्मक परिष्कार: कला इतिहासकारों का मानना है कि गंगईकोंडा चोलपुरम में पाई जाने वाली मूर्तियां और कांस्य कृतियां अधिक परिष्कृत, नाजुक और जटिल हैं, जो चोल कलात्मक विकास के शिखर को दर्शाती हैं।शिवलिंग: जहां तंजावुर में एक विशाल मुख्य शिवलिंग है, वहीं गंगईकोंडा चोलपुरम में दक्षिण भारतके सबसे बड़े अखंड शिवलिंगों में से एक है , जो प्रभावशाली रूप से 4 मीटर ऊंचा है।ऐतिहासिक संदर्भ: राजाराजा के साम्राज्य के चरम उत्कर्ष के दौरान तंजावुर प्रमुख राजनीतिक केंद्र के रूप में कार्य करता था, जबकि गंगईकोंडा चोलपुरम ("गंगा को जीतने वाले चोल का शहर") राजेंद्र के गंगा के मैदानों में विजयी अभियान की याद दिलाता था।

सुबह के ग्यारह बजे हैं...एक प्राचीन शहर तंजावुर में स्थित अमूल्य धरोहर देख अब आगे रामेश्वरम के लिए निकलते हैं। 

दोपहर तकरीबन 3.30 बजे:  यह अरियमान बीच है। यहां से रामेश्वरम बस 21 किलोमीटर दूर है। तो कुछ देर रूकते हैं। यह बीच अपने शांत जल एवं सफ़ेद रेत  के लिए जाना जाता है। बस समझ लीजिये  जल से भरा एक मैदान है और दूर दूर तक घुटनों या ज़्यादा से ज़्यादा कमर तक पानी है, इसलिए बसों में भर भर कर बच्चे आये हैं और पानी में निर्भीक हो अठखेलियाँ कर रहे हैं। एक जत्था नन मिशनरियों का भी है, कुछ बढ़िया पिक्चर मिल जाते हैं, सो शेयर  कर रहा हूँ।







रामेश्वरम जाते हुए समुद्र पर बने पंबन ब्रिज से गुज़रना भी एक नए अनुभव में शुमार हो जाता है। साथ साथ रेलवे ब्रिज भी है। ब्रिज के समाप्त होते ही कुछ रिसॉर्ट्स नज़र आते हैं । मुझे यहां दो दिन ठहरना है । मैं इस वक्त होटल ढूंढने की जहमत नहीं करना चाहता और अपनी कार सामने नज़र आए "टी. ऍम. टी. रिसोर्ट" पर रोकता हूँ । एक शख्श लूंगी पहने नज़र  आता है, 

" मैनेज़र कहाँ है ? "

" मैनेज़र और मालिक मैं ही हूँ, क्या आपको ठहरने के लिए कमरा चाहिए ?" 

" हां बिल्कुल, दो दिनों  के लिए लेकिन ऐसी होना चाहिए।"
 
"मिल जायेगा। यह रिज़ॉर्ट नया है। अभी आठ कमरे हैं। आगे इसे और बढ़ाने की याेजना है।"

उसने मुझे कमरा दिखाया जो उम्मीद से  बेहतर था। सामने खूबसूरत बगीचा और  पीछे बहुत सारी जमीन ख़ाली है बेशक भविष्य के विस्तार के लिए। कमरा दे कर वह आदमी अब पौधों को पानी देने लगा। तो अब माली भी वही है। 

"उसका यह समर्पित भाव सम्भवतः उसे सूकून और खुशी देता हो... आखिर  इसके मायने हर शख़्स के लिए अलग अलग हैं। यक़ीनन आने वाले समय में वह विस्तार कर लेगा आखिर वह रामेश्वरम में है, हिंदुओं के एक प्रमुख तीर्थ में।

दूसरे दिन सुबह 9  बजे,  मुख्य मंदिर के भीतर अभिषेक के लिए काउंटर पर :

"अभिषेक के तीन हज़ार रुपए दक्षिणा देनी होगी। एक साथ पांच छः लोग अभिषेक कर सकते हैं ।" पंडे ने समझाया।

" मगर हम तो दो ही हैं  और बाकी लोगों को कहां से लाए?

"दो हो या छह तीन हज़ार लगता।" पण्डे ने फिर समझाया।

"अच्छा ठीक है, फिर तीन हजार की रसीद काट दीजिए।"

"ठीक है पर पहले बाहर दुकानों से फूल प्रसाद ले आना।"

"ठीक है हम आते हैं।" और इतना कह कर हम बाहर लगी दुकानों से हार फूल आदि पूजन सामग्री खरीदने लगे। तभी वहाँ एक युवती आ कर खड़ी हो गई। 

"भैया ! मुझे भी अभिषेक का सामान दे दीजिए।" उसने दुकान वाले से कहा 

"क्या आप भी अभिषेक करवा रहें हैं। क्या हम लोग साथ में पूजा कर सकते हैं ?" 

"हां क्यों नहीं। वो पंडा भी तो यही कह रहा था।"

" फिर ठीक है।" और फूल प्रसाद ले कर हम पुनः काउंटर तक चले आए।

"मैं अपनी मां को जयपुर से फ्लाइट ले कर आई हूं। उसकी दर्शन की बहुत इच्छा थी। मेरे पिता नहीं हैं।  मेरी मां चल नहीं सकती। क्या यहां व्हील चेयर मिलेगी?" उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें थी।

"अच्छा पता करते हैं। होनी तो चाहिए।" मैंने कहा।

आख़िर व्हील चेयर मिल गई। माताराम को बैठाया गया। हम लोगों ने मंदिर की ओर प्रस्थान किया। मंदिर बहुत बड़ा है। अभिषेक बहुत अच्छे से सम्पन्न हुआ। उस युवती ने धन्यवाद और उसकी मां ने हमें ढेर सारा आशीर्वाद दिया। 
हमें पूजा का फल त्वरित ही मिल चुका था।

22 कुएं : मंदिर परिसर में 22 कुएं हैं, जिनके विषय में कहा जाता है कि इन्हें भगवान राम ने अपने बाणों से उत्पन्न किया था। मान्यता है कि इन कुओं के जल से स्नान करने पर सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

अग्नि तीर्थम: मंदिर के समीप स्थित अग्नि तीर्थम में स्नान करने से शरीर के रोग समाप्त होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अब धनुष्कोडी चलते हैं, जो पास में ही है । दशानन के वध एवं लंका विजय के पश्चात विभीषण के अनुरोध पर भगवान राम ने इस स्थान पर अपने धनुष से सेतु का एक हिस्सा तोड़ दिया था, शायद उसी भाव से जैसे किसी अपराधी को फांसी की सज़ा दे कर जज साहब अपनी पेन की निब तोड़ देते हैं ।









धनुषकोडी के ज़रा पहले बाई ओर एक रास्ता कोठांडारामास्वामी मंदिर की ओर जाता है। यही वह स्थल है जहां रामजी की पहली मुलाकात विभीषण से हुई थी। 




कल सुबह नौ बजे नाश्ते के बाद कन्याकुमारी के लिए निकलना है...

...लेकिन फिलहाल के लिए इतना ही...
दूसरा भाग... शीघ्र ही ...




प्रकाशन तिथि : 28 अगस्त 2026
आखिरी अद्यतन: 
02 अक्टूबर 2026
07 अक्टूबर 2026
(सभी ब्लॉग समय समय पर अद्यतन होते हैं।)


अपने आनंद की रक्षा करें। कुछ श्रेष्ठ पढ़ते, गुनते रहें क्योंकि आप सर्वश्रेष्ठ हैं।

यातायात के नियमों का पालन करें। सीट बेल्ट अवश्य लगाएं।
बहुत जल्द फिर मिलते हैं...

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