ईस्ट कोस्ट रोड...पहला भाग
विजयवाड़ा से रामेश्वरम
ECR (ईस्टर्न कोस्ट रोड)
( पहला भाग)
भारत के कन्याकुमारी में विशाल समुद्र अज़ीम हिंदुस्तान के चरण पखारता है। इस समुद्र का विस्तार पश्चिम में गुजरात और पूर्व में कोलकाता तक है। कोलकाता से कन्याकुमारी तक तट से लगा रास्ता ही ECR यानी ईस्टर्न कोस्ट रोड कहलाता है । ये रास्ते इतने नयनाभिराम हैं कि कुछ तो भारत के शीर्ष दस मनमोहक में आते हैं। कारण है समुद्र के तट से लगा होना। समुद्र की नम जलवायु इन स्थानों को हरा भरा रखती है। फिर दूर दूर तक फैले नारियल के पेड़ इसकी शोभा कई गुना बढ़ा देते हैं।
मैंने अपने गुजरात ब्लॉग में लखपत बंदरगाह का ज़िक्र किया था । सदियों से समुद्र से लगे तटीय क्षेत्रों से विदेशों को सामान आयात निर्यात किया जाता रहा है। ये देश की समृद्धि में एक अहम योगदान देते आ रहे हैं, तो दूसरी ओर इन मार्गों पर यात्रा करने वाले पर्यटक मनोहारी दृश्यों के साथ साथ तटीय इलाकों की समृद्धि के भी साक्षी होते हैं।
फिलहाल इस सफ़र में मेरी रुचि जिन बातों पर थी वे थी, समुद्र तट से लगे मनोहारी प्राकृतिक परिदृश्य और मंदिरों के रूप में प्राचीन विरासत से भरी एक अंतहीन श्रृंखला से सीधा संवाद...साक्षात्कार। इसे मैंने दो भागों में लिखा है।
फरवरी के अंतिम सप्ताह में ग्रीष्म ऋतु ने शीत ऋतु को अपना कार्यकाल समेटने का निर्देश दिया लेकिन मैं जानता था ग्रीष्म को अपने पैर पसारने में कुछ वक्त तो लग ही जाएगा और इसके पहले की ग्रीष्म अपने पूरे उरूज पर हो मैं अपनी बहुसंकल्पित यात्रा पूर्ण कर लूँगा।
विजयवाड़ा से कन्याकुमारी तक अपने पहले भाग की यात्रा में मैंने नयनाभिराम जीवंत दृश्यों को समेटने की कोशिश की है और तब पाता हूं क्यों भारत अद्वितीय है, क्यों इस यात्रा के बगैर भारत को परिभाषित कर पाना या जानना असंभव है, अपूर्ण है।
तो आइए करते हैं भारत की बहुमूल्य संस्कृति से परिपूर्ण छुपी हुई संपदा का एक्सप्लोरेशन...
2 मार्च सुबह दस बजे : विजयवाड़ा की ओर जाते हुए रास्ते में एक मंदिर दृष्टव्य होता है। मंदिर छोटा है किंतु सुंदर है। यहां आसपास कोई नहीं जिससे इस मंदिर के संबंध में और जानकारी मिल सके लेकिन यह हैदराबाद से 68 किलोमीटर दूर श्री शैलम के रास्ते पर मिसिगुंडी पर स्थित मसम्मा देवी के मंदिर से काफ़ी मिलता है। ध्यान से देखने पर पशु बलि के स्पष्ट निशान भी हैं, जो कल दी गई होगी। मंदिर की कलाकृति से अंदेशा है यह देवी का मंदिर है, जो बंजारा जाति की दृढ़ आराध्या हैं और संभवतः इस मंदिर को भी बंजारा जाति ने ही बनाया होगा। कुछ भी हो यह स्थल मनमोहक है। पीछे लगे तालाब और उस पर उगे पेड़ों ने इसे किसी कैनवास पर उकेरी पेंटिंग जैसा बना दिया है। तो जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ,
'रास्ता ही मंजिल है', तो आपको वह सब मिलता है जो आपके कार्यक्रम में नहीं होता।
शाम के चार बजे : यह विजयवाड़ा है, 25 लाख की आबादी वाला एक बड़ा शहर। हमारे हॉटल एस.के. रिवर फ्रंट के ठीक सामने कृष्णा नदी बह रही है। जिस पर 150 वर्ष पुराना प्रकासम बैराज बना है, जो तंगुतुरी प्रकासम के नाम पर है। दरअसल यह ओल्ड विजयवाड़ा है। यहीं से शहर की धड़कन स्पष्ट सुनाई देगी। तो यहीं ठहरते हैं।
शाम सात बजे हैं। दुनियां की सबसे घनी आबादी वाले इस शहर के दर्शन को चलते हैं। बाज़ार चहल पहल से भरे हैं। ऑफिस से घर लौटने वालों ने ट्रैफ़िक लगभग जाम ही का दिया है। रास्तों से सटे फुटपाथ पर मालिनें सुगंधित फूलों से बनी वेणियां बेच रहीं हैं। संपूर्ण दक्षिण में महिलाएं वेणियां लगा कर मंदिरों में दर्शन करती हैं। उनका यह भाव भगवान को अल्लाहदित करता है।
आगे चलने पर एक रेस्तरां जैसा कुछ नज़र आता है। वहां बहुत भीड़ है। उत्सुकतावश हम वहां पहुंचते हैं।
एक व्यक्ति ने बताया, यह व्यवस्था गरीबों, दिहाड़ी मजदूरों के लिए रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध कराने वाली सरकारी पार्टी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की ओर से है। ये स्थायी स्टॉल, जिन्हें अन्ना कैंटीन के नाम से जाना जाता है, मात्र ₹5 प्रति व्यक्ति की दर पर नाश्ता, दोपहर और रात का खाना परोसते हैं जो मूल रूप से मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा शुरू की गई थी। मध्यप्रदेश में भी सरकार मुफ़्त राशन उपलब्ध करवा रही है किन्तु अन्ना कैंटीन का कॉन्सेप्ट बेहतर है। जो सीधे सीधे जरूरतमंद को लाभ पंहुचाता है।
रात के दस बजे: हॉटल में नीचे ही रेस्तरां है। रात का खाना अच्छा है। कल सुबह मंदिर दर्शन के लिए निकलेंगे।
3 मार्च 2026, सुबह 4 बजे :
मंदिर में सामान्य भीड़ है। दर्शन के लिए कोई समस्या नहीं। गोपुरम (स्वागत द्वार) की वास्तुकला बस देखते ही बनती है। यह तो बस शुरुआत है। दक्षिण के सभी मंदिरों में ये स्वागत द्वार (गोपुरम) मंदिरों से भी सुंदर और ऊँचे बनाए गए हैं।
एक रेस्तरां नज़र आता है जिसे बढ़िया तो नहीं कह सकते किन्तु समय निकला जा रहा है सो यहीं रुकते हैं।
वेल्लोर पहुंच कर हमने हॉटल स्ट्रॉबेरी फ्रेस्टो में चेक इन कर लिया है, जो रास्ते पर ही है। वेल्लोर मेरी लिस्ट में नहीं था। मैं ECR नहीं छोड़ना चाहता था। किंतु श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका और वेल्लोर को ट्रिप में शामिल कर लिया। चिंता की कोई बात नहीं आगे मैं कांचीपुरम होते हुए महाबलीपुरम पहुंचूंगा और पुनः ECR ज्वाइन कर लूंगा।
शाम का वक्त है सूर्य देव अपना सफ़र तय कर अब अस्त होने को हैं। मैंने अपना कैमरा निकाल लिया है...
4 मार्च सुबह आठ बजे : श्रीलक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल... वेल्लोर
मंदिर के बाहरी भाग में सोने की पन्नी की 9 से 15 परतें चढ़ाई गई हैं। वेल्लोर के पास श्रीपुरम में इस स्वर्ण मंदिर का निर्माण मात्र सात वर्षों में 24 अगस्त 2007 को पूर्ण हुआ। यह स्वर्ण मंदिर हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। श्री नारायणी पीठम ने इस मंदिर का डिज़ाइन तैयार किया। सोने से ढके माथे पर चांदी की जटिल नक्काशी और कलाकृतियां हैं। प्रकाश व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि शाम के समय भी माथा जगमगाता रहता है। मुकुट 1500 किलोग्राम से अधिक सोने से बना है। इसमें बारीकियों का विशेष ध्यान रखा गया है। चालीस किलो चांदी की श्री गणेशजी की प्रतिमा बरबस ही ध्यान आकर्षित कर लेती है।
वेल्लोर फोर्ट :
श्री लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेंपल से लौटते हुए नज़र आता है, वेल्लोर फोर्ट और इसके भीतर ही है एक छुपा हुआ खजाना जो है अद्भुत वास्तुकला और पत्थरों पर उकेरी नक्काशी वाला जलकंडेश्वर मंदिर, जिसका निर्माण 16वीं शताब्दी (लगभग 1550 ईस्वी) में विजयनगर साम्राज्य के दौरान, सदाशिवराय के एक अधीनस्थ, चिन्ना बोम्मी नायक द्वारा किया गया था। यह मंदिर वास्तुकला की विजयनगर शैली में बना है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं को पत्थरों पर उकेर कर जैसे भारतीय संस्कृति को अजर अमर बना दिया गया हो। दक्षिण भारत के कई प्राचीन मंदिर इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे एकमात्र प्रमाण है प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के, हमारी विरासत और हमारे देश पर अपने अधिकार के।
इन सबमें जो खास बात पर मैंने गौर किया है, वह है दक्षिण भारत की समृद्ध संस्कृति जो ईश के प्रति महान भाव प्रगट करती है और वह है सभी मंदिरों में अभी भी वही प्राचीन रीति रिवाजों से जारी पूजा अर्चन का निर्बाध क्रम।
सुबह के ग्यारह बजे हैं। अब आगे सिर्फ एक घंटे की दूरी पर ही तो है...
हज़ार मंदिरों वाला शहर कांचीपुरम :
कांचीपुरम न केवल कांजीवरम साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है बल्कि कभी यहां हजार से अधिक मंदिर हुआ करते थे जो पल्लव डायनेस्टी की आस्था को उजागर करते हैं और दांतों तले उंगलियां दबा लेने को मज़बूर भी। वक्त के थपेड़ों से बचे लगभग 150 मंदिर अभी भी बेहतर हालात में हैं जिनमें बहुत से सक्रिय भी हैं।
फिलहाल पतली संकरी गलियों में ऑटो से घूमना ज्यादा सुविधाजनक लगा। तो एक ऑटो किया और चल पड़े।
एकम्भरनाथर मंदिर:
का स्वरूप अद्भुत है। मैंने सम्पूर्ण देश में इतने वृहत आकार के मंदिर नहीं देखे। आश्चर्य की बात है इन भव्य मंदिरों का निर्माण करने वाली डायनेस्टी (साम्राज्य ) के महल या किले कहीं दृष्टव्य नहीं होते । शायद वे कहना चाह रहे हों, ईश्वर के आवास के सम्मुख अपने महलों का निर्माण ईश्वर की शान में गुस्ताख़ी हो सकता है। शायद वे यह भी चाहते हों लोग उनके महल नहीं बल्कि मंदिरों में विराजमान देव के सम्मुख नतमस्तक हो, वे देव जिन्हें इतनी भव्यता के साथ स्थापित करना सर्वथा न्यायोचित है। उस वक्त जबकि राजस्थान अपने मज़बूत किलों और महलों के लिए जाना जाता है, भारत का यह दक्षिणी भाग अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।
इनका निर्माण करने वाले शायद जानते थे आने वाले वर्षों में शहर का विस्तार मंदिर को निगल जाएगा। इस हेतु उन्होंने प्रायः सभी मंदिरों में तीन या चार परकोटे यानी चहारदिवारी का निर्माण किया। इस तरह मुख्य गर्भ गृह में विराजे ईश्वर बग़ैर किसी शोरगुल के अपनी अक्षुण्ण शांति भरे वातावरण में वास करते हैं।































































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