Saarpass : Endless adventure with YHAI


Saarpass : Endless adventure with YHAI 


( एक निवेदन : परितोष और मैंने सारपास का यह महत्वपूर्ण ट्रैक मई 2018 में पूर्ण किया था। इसके पश्चात 2019 में कोविड के दौरान मैंने इसे लिखा था। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है, आपका स्नेह वैसा ही मिलता रहेगा जैसे कि मेरे दूसरे ब्लॉग को मिल रहा है। हृदयतल से आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद।)


8 मई...


चंडीगढ़ 325 mtrs. 1056 ft.

Temp. In may 25-37-44°C.


पिन्जौर गार्डन ने अभी भी अपनी रौनक और खुबसूरती बरकरार रखी है। जो ट्रेकर सारपास करना चाहते हैं, वे चाहे तो चंडीगढ़ एक दिन रूक कर आ सकते हैं। चंडीगढ़ का आकर्षण कुछ ऐसा है कि बाद में उन्हें पछताना पड़ सकता है। मेरे लिये यह बहुत मुश्किल था कि मैं  चंडीगढ़ जैसे बेहतरीन शहर को सारपास के इस ब्लाग के साथ समेट सकूँ।  फिर भी बहुत कम शब्दों में में चंडीगढ़ के बारें मे लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।


चंडीगढ़ अद्भुत है। दो प्रदेशों की राजधानी और सेक्टर्स में बँटा चंडीगढ़ ऊँगलियों पर गिने जाने वाले उन चंद शहरों में एक है, जो अपना परिचय खुद देते हैं। यह साफ सुथरा है, व्यवस्थित है, समृद्ध है। यहाँ के बाशिन्दे मेहनती हैं, और उन्होंने अपने परिश्रम से जो धन अर्जित किया है वो महंगी गाड़ियों और भव्य अट्टालिकाओं के रूप में नज़र आता है। वे कमाना, खर्च करना और जीना अच्छी तरह जानते हैं। 














शहर से बाहर पिन्जौर गार्डन अभी भी अपनी शान बनाएं हुए है। जहाँ कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। 


टेकचंद द्वारा स्क्रेप से बनाए बगीचे का कोई सानी नहीं। तो आप रोज गार्डन, माता का मन्दिर घूम कर फिर अपने गंतव्य याने प्रकृति के गोद में बसे,  शहरी भीड़ भाड़ से दूर भुंतर होते हुए कसौल पहुँच सकते हैं। जहाँ  अप्रितम सौदर्य आपकी प्रतिक्षा में पलके बिछाऐ इंतजार कर रहा है...


यहाँ से रात नौ बजे वाल्वो बस से मनाली ( भुन्तर ) के लिये निकलते हैं।



9 मई...

भुंतर ( मनाली )


"... भुन्तर उतरने वाले आगे आ जाऐ...' 


बस कंडक्टर की आवाज ने मुझे जगा दिया। वैसे भी मैं सो कहाँ पाया था। चंडीगढ़ से वाल्वो में बैठने के बाद थोड़ी देर बाद जैसे ही पहाड़ शुरू हुए,  मैं पूरे सफर भर दाए बाए होता रहा।  समझ नहीं आ रहा था कि  सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ, मगर मैंने मान लिया  अच्छी नींद आई और अब मुझे जाग जाना चाहिए। मैंने पारितोष की ओर देखा वो अभी भी खर्राटे भरी नींद में है । तब मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ, तब मैंनेे जाना दरअसल नींद किसे कहते हैं ?


रात के तीन तीस हुए थे और वो मई का महिना था। अब हमें भुंतर से याही के बेस कैंप यानी कसोल जाना था। तो मैं और पारितोष भुन्तर में कसौल जाने वाले रास्ते पर उतर गए। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे बस वाले ने टिकिट के पैसे नहीं देने की वजह से आधी रात को बीच रास्ते उतार दिया हो। कसोल के लिए  अभी कौन सी बस मिलेगी कब मिलेगी ? कुछ मालूम न था, और न  ही कोई बताने वाला।





दरअसल भुन्तर उतरने की सलाह चंडीगढ़ में एक अजनबी नौजवान जिसकी उम्र छब्बीस के आसपास रही  होगी ने दी थी। मेरी पीठ पर रक्सक देख कर उसने पूछा था ,


" क्या आप ट्रेकर हैं " 


मैने कहाँ, "जी बिल्कुल.."


फिर उसने पूछा,


" आप कहाँ जा रहें हैं ?"


मैंने जवाब दिया, 


"कसौल..."


तो उसने सलाह दी, 


"आप मनाली तक न जाऐ बल्कि उसके पहले ही भुन्तर पर उतर जाए।"


मैं भुन्तर में बैठा सोच रहा था, इस रक्सक की वजह से मैं मनाली जाने से बच गया। वरना क्यों रात के तीन बजे मैं यहाँ उतरता ? और देखिये किस तरह चंडीगढ़ के उस नौजवान ने मेरी सहायता की। खैर ट्रेकिंग पर जाते वक्त मैने हमेशा रक्सक के अलावा कभी कोई बैग साथ नही रखा। ख्वामखाह दाग बढाने का क्या फायदा ? वैसे भी सारपास फिलहाल याही का एक कठिन ट्रेक है। आप यह भी कहा सकते हैं, शायद मैंने अभी तक जो ट्रेक किये थे सब आसान थे। मगर जैसा की  मैं  हमेशा कहता हूँ हम पिकनिक मनाने नहीं आये हैं,  सो ट्रेक थोड़ा कठिन हो यह जरूरी भी है... खैर...   


 




रात के इस प्रहर ठंड  इतनी थी कि हम सहन कर सकते थे। उस वक्त सुबह के तीन बज कर पचास मिनट हुए थे और मैं चाय की कोई दुकान ढूंढ रहा था। शायद समय काटने या बोरियत मिटाने को। मेरी इस उधेड़बुन को पारितोष ने ताड़ लिया और शायद वह मन ही मन हँस भी रहा हो। अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात मेरे आग्रह पर उसने YHAI के इस ट्रैक के लिए हामी भर दी। सर्टिफिकेट पाने और नया कुछ करने की चाह भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है।


तो अभी कोई चाय की दुकान नहीं खुलीं थी।


भुन्तर में पार्वती और, व्यास नदी मिलती है। 2011 की गणना के अनुसार भुन्तर की जनसँख्या 4475 थी।  तकरीबन पाँच बजे के आसपास बाजार में कुछ हलचल होने लगी। जिन चीज़ो को अंधेरों ने अपने आवरण में छुपा रखा था वो अब नज़र आने लगी थीं। तो हम किसी बाज़ार के निकट बैठे थे। यह कोई सब्जी और फलों का बाजार था। भुन्तर एक किस्म का जंक्शन होने की वजह से यहाँ से आसपास के शहरों को सामान भेजा जाता हैं। 


सुबह के छह तीस होना चाहते हैं। पौ बस फटने ही वाली है। तभी फल मार्कट से लगे हुए एक चाय के ठेले पर कुछ हरकत हुई। चाय वाले ने  केरोसिन का स्टोव जलाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं जला। फिर थोड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार एक कप चाय बन ही गईं। अब उजाला होने के साथ ही चीज़ें नज़र आने लगी और यकायक महसूस हुआ जैसे हम स्वर्ग के प्रवेश द्वार तक आ पहुँचे हैं। इसीलिए तो इसे कहते हैं "स्वर्ग द्वारी"।



9 May, 

Reporting at YHAI Kasol base camp.

9,10,11,12, May, 

3 days stay for acclimatization at Kasol base camp.

Temp. 15 to 22 degrees Celsius...

Ht. From sea level  1580mtrs. 5135 ft.


तो चंडीगढ़ से लगभग चार हजार फीट की ऊंचाई पर एक ही रात में आ जाने के पश्चात् शरीर इस परिवर्तन के लिये बिल्कुल तैयार नहीं हैं और कई चीजों से सामंजस्य नहीं बैठा पाता। तापमान 35 डिग्री से गिर कर आधा याने 15 तक आ जाता है।  इसलिये हम यहा तीन  दिन के लिये रूकेगे, जो याही का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम का एक भाग है।


YHAI का कसौल बेस कैम्प रास्ते पर ही है। कसौल से बस थोड़ा सा पहले। इसके एक तरफ पहाड़ और दूसरी ओर नदी है। जिसे झरना कहना ज्यादा उचित होगा ऊँचाई से गिरने की वजह से बहुत शोर हो रहा है। हमारा टेन्ट इसके बिल्कुल पास लगा है। झरने की निरंतर आने वाली आवाज़ रात को एक किस्राम का डर पैदा करती है। अभी  बड़ी गहमागहमी है। जैसे ट्रेकर्स का मेला लगा हो। काफी सारे टेन्ट लगे हैं। तीन सौ के आसपास ट्रेकर  होंगे। ये सभी देश के विभिन्न भागों से आऐ हैं।


सारपास YHAI का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। यह ट्रैक  वैसा ही है, जैसा रोड पर चलना। मतलब आपको ज्यादा कुछ सावधानी रखने की आवश्यकता नहीं है। बस याही के नियमों का पालन करते जाईये और ब्रीफिंग में दी गई जानकारियों पर गौर कीजिए।


टेन्ट नंबंर पूर्व निर्धारित है। अपना सामान टेन्ट में रख कर रिपोर्टिंग कर लिया जाता है।कुल  ट्रेकर्स की संख्या छप्पन है, जिसमे बाईस IIT के स्टूडेंट्स हैं।


कसौल इजराइलियों की पसंदीदा जगह है। उनकी यहाँ  बहुतायत है, मगर वे अजनबियों से ज्यादा घुलते मिलते नही और अपने समुदाय में मौज करते हैं। उनमें ज्यादातर स्टूडेंट हैं, जिन्हे कसौल की मादक वादिया कुछ इस तरह रास आ गई है कि, वे इसे अपना ही घर समझने लगे हैं। लोकल्स को उनके इस प्रकृति प्रेम से कुछ आमदनी हो जाती है, जिसका उपयोग वे इन पहाड़ो और अरण्य में अपने जीने के साधन जुटाने में करतें हैं।











10 मई...  

कसौल बेस कैंप : सुबह आठ बजे,


नाश्ते के पश्चात acclimitazation walk  के लिए निकलते हैं एक मैदान तक। वहां कुछ देर के लिए वार्मअप । फिर दोपहर तीन बजे एक ब्रीफिंग जिसमे ट्रेकिंग के दौरान बरतने वाली सावधानियाँ बताई जाती हैं।


11  मई  सुबह 8 -15 पर रॉक क्लाइम्बिंग और उसके पश्चात् दोपहर तीन बजे रेपप्लिंग।















कसौल में  ठहरने के लिये होटल्स हैं,  जरूरी चीजों की शापिंग की यह आखिरी जगह है। क्योंकि कि इसके बाद आप प्रकृति के अनछुए पहलू की खोज में इतने अन्दर चले जाऐंगे  कि बस्तियाँ और गाँव सब पीछे छूट जाऐंगे। रास्ते मे आमलेट और नूडल्स के सिवा कुछ भी मिलने वाला नही  है। सो अपनी जरूरत का कुछ सामान जैसे बरसाती, टार्च की बैटरी, वैगरह यहाँ से खरीद लिया जाता है।  मगर यह भी ध्यान रखना होता है, सामान ज्यादा न हो तो बेहतर है, कुछ दिन कम सामान से भी गुज़ारा किया जाए, मगर उन लोगो को जिन्हे  रक्सक उठाने में परेशानी होती है उनके लिए अलग से आदमी यानी कुली मिल  जाते हैं।  


तो आज का दिन इस स्थान की टोपोग्राफी समझने में चला जाता हैं।दोपहर तीन बजे राक क्लाईबिंग के लिये चलिये.  कैम्प में सारे दिन का कार्यक्रम लिखा है. जो अगले सभी कैम्प में एक सा होगा।



12 मई... 

पहला कैम्प,  गुना पानी...


   

सुबह दस बजे, एक बस कसौल बेस कैम्प से लगभग आधे घंटे की दूरी पर एक स्थान पर रोड के किनारे छोड़ देती है। यहाँ से आज का ट्रेक प्रारंभ होगा। गुना पानी पहला कैम्प हैं। हम दोपहर तीन बजे तक वहाँ पहुँच जाऐंगे। अभी चढ़ाई प्रारंभ नहीं हुई है, मगर जिस चीज के लिये लोग सारपास आते हैं वो प्राकृतिक नज़ारे जिधर देखो उधर नजर आते हैं। एक गाँव से गुज़रते हुए फिर खेतों से गुज़रते हुए और उसके बाद पहाड़ी रास्तों ने तो जैसे आपको बार बार नयनाभिराम दृश्य देने की ठान ली हैं। यह सब अगले दस दिनों तक चलेगा जब तक हम इन वादियों में रहेंगे।


याही की खासियत यह है कि  एक दिन में एक हजार से पंद्रह सौ फीट की ऊँचाई तय की जाती है। इसका फायदा यह है कि मैदानों से आने वाले ट्रेकर्स पर आक्सीजन की कमी या वातावरण के परिवर्तन का प्रभाव नहीं पड़ता और शरीर इन पहाड़ो की कम होती आक्सीजन और वायु दाबाव का अभ्यस्त होता जाता है। 


रास्ते में एक जगह खाने के लिये रूकते है। कुछ लोगों ने आमलेट और नुडल्स के आर्डर दे दिये है। एक आय. आय. टी. मुंबई  का बाईस स्टूडेंट्स का ग्रुप भी आया है।


इस बार कुल छप्पन लोग हैं।  तो पूरे समूह का नाम दे दिया गया,  


"अब तक छप्पन... "






















तीन बजते बजते गुनापानी यानी पहला बेस कैम्प आ जाता है। समुद्र तल से ऊँचाई है तकरीबन पाँच हजार फीट। सभी लोगों ने टेंट में अपनी जगह सम्हाल ली है। आने के साथ ही बगैर देर किये चाय और तले हुए मूंगफली के दाने। यह याही का सबसे खूबसूरत प्रबंध है।


या फिर गरमा गर्म पकौड़े और चाय... मीलों फैली खूबसूरत वादियां... बस और क्या चाहिए ?


रात का खाना शाम होते ही खा लिया जाता है, क्योंकि लाईट नहीं होती। खाने मे दाल चावल, रोटी सब्जी और एक मिठाई है, बेशक सलाद और पापड़ के साथ। खानसामा ने पीने के लिये गर्म पानी की भी व्यवस्था की है, जिसे क्रबंल से बचने के लिये सफर के दौरान बीच बीच में पीना पड़ता है।


9 बजे तक सभी सोने की तैयारी कर रहे होते हैं, तभी व्हीसिल बजती है, कैम्प लीडर ट्रेकर्स का बच्चों की तरह खयाल रख रहे हैं। गर्म बोर्नवीटा मिल्क तैयार है, और अभी कुछ देर कैम्प फायर भी होगा।


निर्जन वन में कभी कभी किसी जानवर की आवाजें आती है। मई के इस महिने में हम स्वेटर पहन कर और अपने स्लीपिंग बैग जो एक कैप्सूल की तरह है, के भीतर महफूज़ है। 



13 मई ... फ़ूनल पानी...ht.9500 feet



आज फूनल पानी तक पहुंचना है।  हमेशा की तरह छप्पन ट्रेकर्स के इस समूह को रास्ता दिखाने के लिए एक आगे और एक पीछे दो गाइड है। जो सम्पूर्ण ट्रेक के दौरान साथ रहेंगे। यहाँ गुम हो जाने की सजा जान पर भारी पड़ सकती है।

गुनापानी से नाश्ता कर निकले थे साथ में टिफिन भी दे दिया गया था।


यह ट्रेक जबसे प्रारम्भ हुआ है यानी कसौल के पश्चात तभी से वो प्राकृतिक दृश्य प्रारम्भ हुए है जो सपूर्ण ट्रेक के दौरान साथ रहेंगे। रास्ता पगडंडियों का है, तो कभी समतल कभी चढाई तापमान पंद्रह डिग्री सेल्सयस के आसपास है जो बहुत ज्यादा आरामदायक है इस मौसम में थकान न के बराबर है। ज़रा देर चाय के लिए  रूकते हैं। 


वही पहाड़ी रास्ते, मगर प्रकृति के दृश्य पल पल परिवर्तित होते रहते हैं। शहर से आऐ सभी लोगों के लिये यह अनुभव किसी स्वर्ग से कम नही। बारह के आसपास गाईड रूकने का इशारा करता है उसकी भाषा कोई नहीं समझता बस इशारों में बात होती है, मगर टूटी फूटी हिन्दी बोल लेता है। फूनल पानी पद्रह मिनिट के रास्ते पर है और अभी दो बजे है याही के नियमानुसार तीन के आसपास कैम्प पहुँचना होता है इस करके कि ट्रेकर्स ज्यादा तेज न चले तो कारवां यही रूक जाता है. कुछ लोग फोटोग्राफी कर रहे हैं। मैंने बैटरी बचा कर रखी है, जिसे मुझे आखिर तक चलाना है। रास्ते पर रिचार्जिंग की कोई व्यवस्था नहीं है। हम सारपास क्रास करते वक्त बर्फ से गुजरेंगे।









फूनलपानी पर जमीन समतल नहीं है ईश्वर न करे रात को बारिश हो गई तो ? हम कसोल से दो दिन की दूरी पर है।


सारपास का यह ट्रैक पूरी तरह से मौसम पर निर्भर है। यदि यह बिगड़ जाता है तो कैंप लीडर ग्रुप को वापस भेजने में ज़रा भी देर नहीं करते। और yhai अपने कड़े नियमों के लिए जाना जाता है।


गर्म चाय के साथ मूँगफली दाने...ओह क्या बात है....एक पहाड़ी झरने से बहने वाले सर्द ठंडे पानी में खानसामा ने पाईप लगा दिया है। लो जी हो गई व्यवस्था। चाहे तो नहा लीजिये। यहाँ रात का तापमान पद्रह डिग्री है। हम जैसे जैसे उपर चढ़ेंगे यह और नीचे गिरेगा।


छप्पन ट्रेकर्स मे से कोई भी वापस कसौल पहुँचने तक नहीं नहाया सिवाए एक के। लेकिन एक बहादुर इन्सान रोज सुबह ठंडे पानी से नहाता है। वैसे इस सर्द मौसम में नहाने की जरूरत ही महसूस किसको होती है? हम चौबीस घंटे ताज़े रहते हैं।


शाम ढलने के पहले डिनर पूर्ण हुआ। दिन भर चलने के पश्चात भूख लगना स्वाभाविक है। उस पर पहाड़ों का शुद्ध जल। हर चीज अपने सौ प्रतिशत शुद्ध रूप में।


सुबह छह बजे व्हीसिल की आवाज़ के साथ ही नींद खुलती है।


सारपास का यह ट्रेक इस तरह होगा।




1_Base camp kasol

2_GUNA PAANI

3_FUNAL PAANI

4_ZIRMI

5_TILA LOTNI

6_BISKERI THATCH

7_BHANDHAK THATCH

8_BASE CAMP KASOL



14 मई...झिरमी 14000 फीट


आज दोपहर तक झिरमी पहुँचना है।गाईड ने बताया कुछ जगह चढ़ाई होगी । आखिरकार हम इसीलिए तो यहाँ आऐ हैं। नाश्ते के पश्चात सफर प्रारम्भ हो जाता है। नयनाभिराम दृश्य पीछा नहीं छोड़ते और प्रतिपल बदलते रहते है। अभी वातावरण में आक्सीजन का प्रतिशत पर्याप्त है,  सो श्वास लेने में कोई परेशानी नहीं है। इसी वजह से हरियाली याने पेड़ पौधे भी काफी मात्रा में हैं। हम जैसे जैसे उपर की ओर जाऐंगे, आक्सीजन की कमी से वे कम होते जाऐंगे फिर जगह जगह बर्फ दिखने लगेगी। फिलहाल मई की गरमी में भी मौसम सुविधाजनक है। दिन का तापमान अठारह से पच्चीस और रात का सात आठ के आसपास। सारपास याही का सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला और बहुत जल्द बुक होने वाला ट्रेक इसलिये भी है कि यह युवाओं को पर्याप्त चुनौती देता है और दूसरा बर्फ और तीसरा इसके फिल्मों में दिखाऐ जाने वाले जैसे सुन्दर दृश्य।


गाईड के इशारे के साथ ही सभी लंच के लिये रूकते है। जो फूनल पानी कैम्प से पेक्ड लंच मिला था वो खोल लिया जाता

है मगर गरमागरम नूडल्स और आमलेट भी कुछ पैसे दे कर लिये जा सकते हैं।


लंच के पश्चात अब झिरमी कैम्प तीन बजे तक आ जाएगा।






समुद्र तल से चौदह हज़ार फीट पर झिरमी से यहां वहां बर्फ बिखरी दिखाई देने लगती है। जो मैदानों से आए हम लोगों के लिए कौतूहल पैदा करती है।

अगला पड़ाव 12500 फीट पर स्थित टिला लौटनी है।


15 मई...12500 फीट टिलालौटनी,










तो टिला लौटनी पहुंचते पहुंचते तीन बज जाते हैं अब जैसे जैसे ऊंचाई बढ़ती है रास्ते में बर्फ बिखरी दिखाई देती है। ऑक्सीजन स्तर कम होने से ज़मीन पर पेड़ पौधे न के बराबर हैं। आसपास के गांव वालों ने पत्थरों के ढेर बना कर उसे मंदिर की तरह पूजा स्थल बना दिया है। किसी भी तूफान से देवता उनकी रक्सेषाअ करेंगे। Yaahi ने सिक्किम और गंगटोक से गाइड बुलवा लिए हैं। उन्हें हड्डियों को जमा देने वाली ठंड में रहने का खूब अनुभव है। वे अस्थाई रूप से यही टिला लौटनी में कैंप में रहते हैं उनका काम है ट्रेकर्स को यहां से सारपास पार करवा कर अगले कैंप यानी बीसकेरी थाच तक छोड़ना।

12500 फीट पर स्थित टिला लौटनी से पहाड़ों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। समूह में कल सारपास से गुजरने का उत्साह है।

16 मई ..सारपास..13800 फीट

सुबह के पांच बजे हैं। चाय नाश्ता कर सारपास के लिए निकलना है। कार्यक्रम यह है कि ग्यारह बजते बजते सारपास पार कर लिया जाए। इसके बाद तूफ़ान और धूप में आइस स्लाइडिंग का खतरा बढ़ जाता है। कल मौसम बिगड़ने से एक समूह टीला लौटनी से ही वापस चल गया था। संयोग से आज मौसम साफ है।

13800 फीट पर सारपास वो जगह है जिसके लिए हम यहां आए हैं। घुटनों तक पैर जमीन में धसे हैं।




 


एक शॉर्ट ब्रिफिंग में सबसे काले चश्में लगाने का अनुरोध किया जाता है। ताकि स्नो ब्लाइंडनेस और स्किन बर्निंग से बचा जा सके।



दूर दूर तक सिर्फ बर्फ और बर्फ़ से ढके पहाड़



कुछ ट्रेकर्स को श्वास लेने में थोड़ी परेशानी हो रहीं है, लेकिन फिर सब ठीक हो जाता है।
तय समय में सारपास पार कर लिया जाता है। अब चुकी बर्फ पर तेज़ ढलान है yaahi ने इसे पार करने का एक आसान रास्ता खोज निकाला है। बारी बारी से ट्रैकर अपने अपने बैग पर बैठ कर फिसलते हुए नीचे आ जाते हैं।

और ढाई बजते बजते छप्पन ट्रेकर्स का यह समूह बीसकेरी थाच पहुंच जाता है।

तो आज की रात रुकेंगे बीसकेरी थाच 11000 फीट पर।

17, 18 मई .. बंधक थाच 

बंधक थाच वह जगह है जिसे बस फ़िल्मों में देखा जा सकता है। इसकी खूबसूरती बयान नहीं की जा सकती। यह आखिरी कैंप है। कल सुबह नौ बजे एक बस सोलह किलोमीटर दूर बेस कैंप तक छोड़ देगी। यह ट्रैक यहीं खत्म होगा। 

लेकिन yahi के एक से बढ़ कर एक ट्रैक हमारी और आपकी प्रतीक्षा में हैं। तो कब जा रहें हैं आप  सारपास ?

Yahi को ढूंढना गूगल पर मुश्किल नहीं। तो हो आइये अपना एक ग्रुप बना कर प्रकृति से रूबरू होने के लिए। जैसा कि yahi का नारा है,

'प्रकृति की ओर लौटो',

अभी के लिए इतना ही..

लेकिन उत्साह का, साहित्य का और ज़िंदगी का सफ़र ज़ारी रहेगा। चलिए मिलते हैं फिर किसी यात्रा में, कहानियों और कविताओं में...






ईश्वर में आस्था बनाए रखें और 

आनंद में रहें हमेशा...

फिर मिलते हैं...





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