यात्रा वृतान्त_2. ( कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में....)

यात्रा वृतान्त….2 

कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में... 
(कुल शब्द 4065,  पढ़ने में लगने वाला समय...20  मिनिट..)
   
अभी तक आपने पढ़ा शेगाव और जैजुरी के नायाब मंदिरो के बारे में अब आगे पढ़िए....


   20.12.2018 (318km/1491km) 06.30PM 

दूसरे दिन बारामती वाले परिजन से विदा ले कर पूणे चलते हैं। महंगे से महंगे होटल में आराम तो मिल जाता है, मगर घर जैसा एहसास नहीं मिलता। तेजी से भागते वक्त में से कुछ  वक्त चुरा कर  रिश्तो को नयी  ताज़गी से  भर देना  ही उद्देश्य होना चाहिए। पुणे से केरल की  फ्लाईट ग्यारह बजे की है। लगभग आठ बजे पूणे पहुँचते हैं। पारी एवं प्रीती एयरपोर्ट के भीतर दाखिल हो चुके हैं। एक खालीपन महसूस होता है।

6.00PM नासिक। सदा प्रसन्न रहने वाले मलिक दादा पचहत्तर पार कर चुकें हैं। उनके स्वास्थ्य का राज सदा खुश रहने में छुपा है। खुश रहना तो ईश्वर की हवा पानी की तरह मुफ्त दी हुई चीज है, मगर ऐसा बहुत कम लोग कर पाते हैं. इस बात से सीख लेते हुए मैं कुछ दिन से एक प्रयोग कर रहा हूँ किसी तनाव में मुस्कुराने की कोशिश और अब यह मेरी आदत बन गई है सो अब चिन्ता चेहरे पर ज्यादा देर ठहर नहीं पाती।

21.12.2018(163km/1654km) 09.00AM 

दूसरे दिन गरम इडलियों का नाश्ता कर अलविदा कहने का वक्त आ जाता है। मैं मलिक दादा से सूरत के लिए मार्ग तय कर रहा हूँ। मैंने कहा,

“मेरा सपुतारा, सोनगढ़, बारडोली के रास्ते सूरत जाने का विचार है…”

“नहीं आप वलसाड, नवसारी मार्ग से सूरत जाए। " 
वे मार्ग सुझाते हैं।

"अच्छा अलविदा...." 

  "अलविदा...."वो मुस्कुराते हैं।

तो उनकी बात मान कर उसी रास्ते चल पड़ते हैं. 235 कि.मी. इसी मार्ग को गूगल पर निर्धारित कर  मैंने सीट बेल्ट बाँध लिए हैं।

"वृक्ष कितना भी पुराना हो जाए छाँव देने की अपनी आदत नहीं छोड़ता..."मैं बुदबुदाता  हूँ।

"हम्म्म्म कुछ कहा आपने ?"

" नहीं...."मैंने कहा।   

कुछ देर तक शहर साथ साथ चलता रहा फिर घाट शुरू हो गए। जंगल का यह फैलाव जबलपुर से महाराष्ट्र तक है। गुजरात की सीमा आरम्भ होने तक रहेंगे। गुजरात में जो मार्ग मैंने तय किये  यानी सूरत अहमदाबाद और भुज  तक कहीं जंगल या घाट नहीं हैं। बस  मैदान है, या तो खेत है या फिर समुद्र। गीर और आसपास के भाग में जंगल  जरूर  है। गीर मेरी लिस्ट में नहीं हैं। मध्यप्रदेश के जंगलों में मैं पर्याप्त शेर देख चुका हूँ। 

फिलहाल इस मार्ग पर ट्रैफिक न के बराबर है। कहीं कहीं रास्ते पर काम चल रहा है। बस यही कोई तीस चालीस की गति होगी। अभी तक के सफर में जो मार्ग मुझे मिले वो सामान्य से बेहतर है। अधिकतर रास्तों पर गति सौ के आसपास रहीं होगी। तो कह सकते हैं पिछले कुछ वर्षों में स्थिती में काफी सुधार आया है। जहाँ रास्ते खराब भी हैं उन पर काम चल रहा है।

       “सफर का आनंद लेने के लिये बस एक ही ख्वाहिश होना चाहिए, वह यह कि यात्रा ही गंतव्य हो जाये।  बात इतनी सी हैं कि,

"जो हैं बहुत अच्छा हैं। जो पल ईश्वर ने बक्शे हैं, खूबसूरत हैं.…”

मैंने कहा। मगर उसने कान में ईयर फोन लगा रखें हैं।शायद उसने ठीक से सुना नहीं। कोई प्रतिक्रया व्यक्त नहीं की। ख़ैर कोई बात नहीं।

आगे यह रास्ता हाईवे से जा मिला और ऐजिंल की स्पीड फिर से सौ तक जा पहुँची। तकरीबन बारह बजे ‘नाना पोंडा’ पर लिखे साईन बोर्ड ने मुझे चौंका दिया। या यूँ कहें मन गदगद हो गया जैसे कोई खजाना मिल गया हो।

"दमन के लिये इधर मुड़िये..." 

"यार ये दमन कहाँ से आ गया ? ये तो हमारी योजना में नहीं था।"

"योजना में नहीं था। वो बाराडोली, सोनगढ़, वाले रास्ते से जाते तो ये न आता। हम मलिक दादा के अहसानमंद हैं। उनके द्वारा बतलाऐ रास्ते से आ रहे हैं। अब आगे सूरत है, और बाएँ दमन...?" 

"ओह तो यह बात हैं..? हमें मलिक दादा का शुक्रिया अदा करना चाहिए। दमन की इस यात्रा का श्रेय उनको जाता है. मैंने मुस्कुराते हुए कहा।" 

"हाँ…बात तो यहीं हैं..."उसने कहा।

"दमन यहाँ से कुछ ही दूरी पर है। आप एक देड़ घंटे में पहुँच जाएंगे।" उस बूढी औरत ने कहा जो नारियल पानी बेच रहीं थी।

"दो नारियल पानी देना, माताराम...." मैने कहा।

"माताराम....?" 

"माताराम यानी माँ, माई, हमारे जबलपुर में ऐसा ही कहते हैं।" और यह सुनकर वह दांत निपोर कर हँसने लगी।

मैने नीलम से  कहा, 

"दमन तो रास्ते में ही आ गया फिर दमन ही चलते हैं। यूँ इस तरह इसे छोड़ कर जाना ठीक न होगा..?"

"अच्छा हुआ हमने आगे होटल की बुकिंग नहीं करवाई तो.। तो यह निर्णय सही है।" 

12.40PM 

और नारियल पानी पी कर मैने ऐंजिल को दमन के रास्ते पर मोड़ दिया। रास्ते के दोनों ओर पेड़ जैसे सलामी दे रहे हो. क्या दमन हमारा स्वागत कर रहा हैं ? मैने दमन के बारे पढ़ा था यह केन्द्र प्रशासित प्रदेश है। ऐसा क्यों होता हैं कि समुद्र किनारे बसे हर शहर खूबसूरती की चादर ओढ़े रहते हैं ? और वहाँ रहने वाले मस्त प्रकृति के मालिक होते हैं शायद समुद्र उनके भीतर अपनी विशालता भर देता है।






01.15PM 

दमन के पहले पुलिस चैक पोस्ट है। वे अपने रजिस्टर में कुछ सूचनाऐ जैसे कहाँ से आऐ कहाँ जाएंगे नाम पता वैगरह दर्ज करते हैं। यह जानकारियाँ सरकार और पर्यटन को प्रमोट करने वाली कंपनी के काम आती है। आगे दायीं ओर एक रंग बिरंगी शाप नज़र आती जिस पर मछलियों के बड़े बड़े चित्र बने हैं। शायद एक्वेरियम हो। मैं कार रोक देता हूँ। भीतर प्रवेश करता हूँ। बड़े बड़े टबो मे जिन्दा मछलिया हैं। आधे किलो से दस किलो तक। सब जिन्दा हैं ,जो चाहिए, खाने के लिये खरीद लिजिये। दमन के अरेबियन समुद्र से पकड़ी हुई....बिल्कुल ताजा.... 

1523 में जब पुर्तगाली डिओगो डी मेलो ओरमुज़ की ओर जा रहे थे। वह एक हिंसक तूफान में फंस कर दमन के तट तक आ गए। इसके तुरंत बाद, यह एक पुर्तगाली उपनिवेश के रूप में बस गया। जो 400 वर्षों से अधिक समय तक चला। दमन को दमन गंगा नदी ने दो भागों में बांटा है। नानी- दमन अर्थात छोटा दमन, और मोती-दमन अर्थात बड़ा दमन. मोति दमन में 16 वीं शताब्दी में एक बड़ा किला बनाया गया उसके भीतर ही एक चर्च, बाजार और नगर निगम के सरकारी दफ्तर भी बसा दिये गए हैं।
           
नानी दमन नया दमन है। यह बेहतरीन तरीके से बसा है. बढ़िया होटल। सुन्दर , भव्य ईमारते बढिया रोड, और बढ़िया खाना, इसकी पहचान है। लगता नहीं कि यह सिर्फ टूरिस्ट पर ही निर्भर है। दमन की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषी, फिशिंग, काटेज इंडस्ट्रीज , उद्योग और टूरिज्म हैं. यह क्षेत्र पर्याप्त समृद्ध नजर आता है।

दमन हो और शराब की बात न हो, यह असंभव है। गुजरात में पाबन्दी के पश्चात अपनी इस इच्छा का दमन कर चुके लोग दमन में गला तर करने को आते हैं। तो यहाँ शराब की इतनी दुकाने हैं की यदि आप कहीं भी पत्थर फेंके तो वह इनमे से किसी एक पर ही लगेगा। ये बड़े बेहतरीन ढंग से सजी हैं। मन भटकने लगता है मगर मुझे अभी एक लम्बी ड्राइव करनी है।


जम्पोरा बीच, देविका बीच,  हाई टाईड और लो टाईड के शिकार होते रहते हैं। सुबह आठ बजे समुद्र का पानी बिल्कुल किनारे चला आता है मगर जैसे जैसे समय बीतता है, तकरीबन शाम के पाँच बजे यह ढाई से तीन किलोमीटर दूर चला जाता है। पीछे छोड़ जाता है दलदली रेत, छोटे बड़े गढ्डें। समुद्र का पानी इस दो ढाई किलोमीटर के क्षेत्र में बस एक या देढ फिट गहरा होता है। चित्र देखे । सो लहरे नहीं चलती मगर पर्यटकों की गहमागहमी रहती है।

22.12.2018(300km/1696km) 09.00AM 

मैं अब सूरत के रास्ते पर हूँ। मुझे ज्ञात हुआ हजिरा मुख्य सड़क से बीस पच्चीस किलोमीटर पर है तो अधिक जानकारी के लिये हमने एक अजनबी से पूछा..

 "हजीरा में देखने लायक कुछ है क्या ..?" 

"वहा सिर्फ इन्डस्ट्रीज हैं, और देखने के लिये कुछ खास नहीं है।"  उसने कहा।

( पाठक इस व्यक्ति पर गौर करें यह हमारी कहानी का दूसरा व्यक्ति था. तो अभी हमे दो व्यक्ति और मिलेंगे...) 

मैंने उसकी बात न मानते हुए कहा, 

"हजीरा रास्ते से पच्चीस किलोमीटर ही तो अंदर है। तो चल कर देखते हैं।" 

थोड़ी दूर चलने पर रास्ते खराब होते गए। जैसा कि उस अजनबी ने बताया हजीरा में देखने लायक कुछ खास न था. पोर्ट भी दूर था। सो वापस सूरत अहमदाबाद रास्ते तक लौट आए और सूरत की और चल पड़े। 

1.00PM 

सूरत बस आने को है। एक व्यवसायिक शहर के रूप में महत्वपूर्ण है। अलावा इसके कुछ खास नहीं जिसके लिये मैं समय खराब करू। मैंने कुछ जगहों के बारे में पढ़ा था जैसे दमास बीच जहाँ भूत नजर आते हैं और मेरा इरादा भूत दर्शन का बिल्कुल न था। अमेजिया वाटर पार्क मैं जरूर जाता गर बच्चे साथ होते। बाकी चीजें मुझे आकर्षक लगी नहीं। मैं जिन जगहों पर आपको ले जाना चाहता हूँ, वे आपके सम्मुख आ ही जाएँगी। सो सूरत शहर से गुजरते हुए मैं इस शहर को जितना देख सकता था उतना देखता हुआ सूरत अहमदाबाद हाईवे पर चल पड़ता हूँ।

अचानक मैं महसूस करता हूँ, एक्सप्रेस हाइवे पर डिजायर, सांता  फे, मर्सीडीज, फार्चुनर, आदि गाड़िया मेरे दोनों तरफ से आगे निकलने लगती हैं। अचानक ये क्या हुआ ? लगता है रेस लगी है।  मैने ऐसा कहीं नहीं देखा। गाड़िया बंदुक से निकली गोलियों की तरह चल रहीं हैं। मुझे अब अपनी गाड़ी की स्पीड भी बढ़ानी  होगी वरना वो मुझे किनारे की और धकेल देंगे। मतलब 120 से 140 किलोमीटर प्रति घंटे।स्पीड कम रखने पर पीछे से तेज हार्न बजने लगते हैं।  ऐसा दो घंटे तक चलता रहता है। तभी मुझे ख्याल आता हैं मैं पर्यटक हूँ और मुझे इस रेस से बाहर होना है। मैं थका हुआ भी हूँ। मैंने कार  को किनारे पर पार्क कर दिया। एक आदमी तरबूज और नारियल पानी बेच रहा है। हम एक  तरबूज ले लेते हैं। खाते हैं और थोड़ी देर के लिये एक पावर नेप ले लेते हैं।

यह मार्ग सूरत को अहमदाबाद से जोड़ता है। अहमदाबाद राजधानी है गुजरात की और सूरत एक प्रमुख व्यापारिक स्थल, ऊपर से गुजराती।तो यह सब मिल कर व्यवसाय में एक सुनामी ले आते हैं। चिकनी सड़क, बंदरगाह ,और सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं, जिंदगी में कुछ कर गुजरने वालो की रफ़्तार बढ़ा देती है। यह सब मिल कर भारतीय अर्थ व्यवस्था में क्रांति ले आते हैं। पैसा तो जैसे यहॉं  बरस रहा है। इस मार्ग पर चलते हुए फख्र होता है, हम भारतीय हर तरह से सक्षम हैं। किसी से कम नहीं।

गुजरात की अर्थव्यवस्था में उद्योग बड़ी भूमिका निभाते हैं। पेट्रोल रिफायनरी फिशरीज,नमक, के साथ कृषि में मूँगफली गन्ना शक्कर आदि की फसल प्रमुख हैं। दूसरे राज्यों की तरह  गूजरात भी फल फूल रहा है।

4.15PM  वड़ोदरा। 

हम  यही रूकने का निर्णय लेते हैं। अभी अहमदाबाद सौ कि.मी. है। वैसे भी आज अहमदाबाद पहुँच कर भी हम कुछ देख नहीं पाएँगे और मै भरपूर नींद लेना चाहता हूँ। 

वडोदरा पहुँच कर एक मजेदार बात होती हैं नेट  मुझे कमरो की दर दिखा रहा हैं, पद्रह सौ और होटल का मेनेजर कहता हैं, "दो हजार।" 

"फिर आप नेट से ही बुक करवा लिजिये।"

उसने कहा.. 
मैंने वहीं बैठ कर कमरा बुक किया।इसके बाद रूम बाय लिफ्ट से सामान कमरे में पहुँचा देता है।






आइये नजदीक ही गायकवाड़ महाराज का महल भी देख लें। यहाँ हम एक गाईड लेंगे जिससे उन पन्नों को पढ़ा जा सके जो हमारी आँखों से छुपे हुए हैं। मगर यहाँ कोई गाइड नहीं है। मेरे पता करने पर एक कर्मचारी मुझे एक कमरे में ले जाता है। वे मुझे दो आई पॉड देते हैं। बस मुझे उसे ऑन कर तीर के निशानों पर चलना है। एक रिकार्डेड कमेंट्री गाइड का काम करती है। गायकवाड़ महाराज के परिवार के लोग अब भी ऊपरी मंजिल पर रहते हैं। नीचे की मंजिल पर्यटकों के अवलोकनार्थ खोल दी गई है। रिकार्डेड गाइड ने आगे कहा अपने महल से स्कूल तक राजा ने एक छोटी रेलगाड़ी बिछवा दी थीं, जिस पर महलों के बच्चे स्कूल जाया करते थे। यह आज भी गतिमान है।


“महाराज गायकवाड़ का यह महल पूर्ण नहीं हो पा रहा था. इसका कारण इसके वास्तु कला में दोष था। अन्तः परेशान हो कर  वास्तुकार ने आत्महत्या कर ली। इसके पश्चात आये वास्तुकार ने इस महल को पूर्ण किया। बरसो बरस बाद भी गायकवाड़ महाराज के परिवार का यहाँ रहना इस बात का भी प्रमाण हैं कि इसे किस मजबूती के साथ बनाया गया होगा। एक बड़े हाल में नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र रखे हैं। 

महल के सामने फोटोग्राफरो से घिरी एक लड़की अपने रंगबिरंगे परिधानों में प्री वेडिंग फोटो शूट करवा रहीं है। साथ लगा एकड़ों तक फैला हुआ गोल्फ कोर्स भी है। गोल्फ कोर्स पर कुछ लोग गोल्फ खेल रहे हैं। ये सभी लोग आज के महाराज हैं। उनकी भाव भंगिमा से प्रतीत होता है, वे हर चिंता से मुक्त, वक्त के उस स्तर पर आ चुके हैं, जहाँ जिंदगी सिर्फ और सिर्फ आनंद का नाम है। उन्होंने कुछ बेहतरीन काम किये हैं। परिश्रम, और बुद्धि के साथ किस्मत का योग हो जाने से उनका व्यक्तित्व दमक रहा है। इन सबके मेल के परिणामत: एक सुकून उनके चेहरे पर स्पष्ट नज़र आता है। वे विशुध्द रूप से विलासिता में जीने के योग्य ही बने है।


महल के सामने एक बड़ा सा पूल है। यह नहाने के  लिए नहीं है। जब इसे जल से भर दिया जाता था तब महल की प्रतिच्छाया इस पूल में दृष्टिगोचर  होती थी। रात को महल की सारी लाइटें जला दी जाती थी जो जनरेटर से चलती थी तब यह सब खूबसूरत जान पड़ता था। जब पैसा बेहिसाब हो तो आपको बस कल्पनाशील होना पड़ता है फिर स्वप्न को यथार्थ में परिवर्तित होते देर ही कितनी लगती है...? 

कुछ सःह्रदय राजा मजदूरों को रोजगार देने के उद्देश्य से भी निर्माण कार्य जारी रखते थे। इसमें उन मजदूरों का खून पसीना बहा है। तभी ऐसी  सरंचनाओं का निर्माण होता है। आज जिन्हे देख कर हृदय गौरवान्वित  है। 

23.12.2018...1.00PM (111k.m./1807k.m.) 

दूसरे दिन वड़ोदरा से निकलते हैं और काकरिया  लेक, अहमदाबाद पहुँचते हैं। लेक की पार्किंग में कार पार्क करने के पश्चात वहाँ सिक्युरिटी का कोई व्यक्ति नजर नहीं आया। मैंने एक लोकल से जब पूछा तो उसने जवाब दिया 

"आप गाड़ी खड़ी कर दे। यहाँ पार्किंग वाला कोई नहीं होता सभी गाड़िया ऐसी ही खड़ी रहती हैं।" 

वहाँ सैकड़ो कारें और बाहर से टुरिस्ट को ले कर आई कुछ बसे खड़ी थीं। लेक पर बोटिंग और चारो और खाने पीने की दुकाने बनी हैं। एक टॉय ट्रेन पार्क का चक्कर लगा रही है। दो घंटे बिताने के पश्चात जब मैं पार्किंग तक वापस आया तो मैने देखा मेरी कार पीछे फँस चुकी हैं और भी कारे फंसी हैं। तभी वहाँ कुछ गुजराती इकठ्ठे हो जाते हैं। उन्होंने गलत तरह से पार्क की हुई गाड़ियों के मालिकों के कार नंबर पार्क के लाऊड स्पीकर पर एनाऊंस करवा दिये। वे लोग तुरंत आए और अपनी गाड़िया हटा ली। यह सब काम बिना किसी लड़ाई झगड़े के संपन्न हो गया। कई जगह इतनी देर में लोग हड़कम्प मचा देते हैं। यहाँ गुजरातियों के मिल कर काम करने, आपस में बेहतर सामजस्य और सूझबूझ नजर आती है।





          
आटो वल्ड विन्टेज म्युजियम के लिये देखने के लिए अभी समय बाकी है। मैंने  गूगल मैप को सेट कर दिया। गूगल तुरंत अपना काम आरम्भ कर देता हैं। गाड़ी एक बेहद सकरी गली से गुजरने लगती है, इतनी सकरी कि लोग करीब करीब कार से टकरा रहें हैं। ओह यह कोई मुसलमान मोहल्ला है।यहाँ मुसलमान औरते भी हैं, जो बुर्का ओढ़े हैं। चारों ओर मुसलमान ही मुसलमान हैं, जो खरीद फरोख्त में लगें हैं। बकरो और मुर्गो की भी खरीद फरोख्त हो रहीं है। तो यह मुस्लिम बहुल इलाका है। गुगल आपको कम दूरी वाले रास्तों से और जल्द से जल्द गंतंव्य तक पहुँचाने की जद्दोजहद में होता है। बेहद धीमे चलते हुए आखिरकार वहाँ से निकल ही गए और कुछ दूरी तय करने के पश्चात विन्टेज कार म्यूजियम तक आ पहुँचे।

श्री प्राणलाल भोगीलाल पटेल द्वारा निर्मित इस कलेक्शन में करीब करीब सभी विन्टेज कार देखने को मिल जाती हैं। सौं कारे होगी या शायद ज्यादा भी। 1906 मिनर्वा से 1954 फोर्ड तक। उनमें से कई अभी भी चालू हालत में हैं। दो हजार रूपयो में आप सपरिवार कुछ किलोमीटर की सैर कर विन्टेज कार में बैठने का अपना सपना भी सच कर सकते हैं। ताज्जुब होता हैं जब हम भारतीय अंग्रेजो की गुलामी से लड़ रहें थे तब वे इस तरह की गाड़ियां बना कर अपनी सफलता का जश्न मना रहे थे। बरसो बरस हम भारतीयों की योग्यता का सही दोहन नहीं हो पाया। अब वक्त बदल रहा हैं आज हममें से एक भारतीय गूगल और कई अन्य भारतीय इस जैसी कंपनियों को चला रहे हैं। इतना ही नहीं हमने अंतरिक्ष में भी पैर पसार लिये हैं। मौके मिले तो इन्सान क्या नहीं कर सकता....

6.00PM 

आटो वल्ड विन्टेज म्युजियम के पास ही हैं होटल अपोलो. इस होटल का मालिक प्रवेश द्वार पर ही मिल जाता है। मैंने कहा,

“आपकी होटल बहुत अच्छी है। गुजराती बहुत बढ़िया मैनेजमेंट करते हैं।”

वो जरा एम्ब्रेस्ड  हो जाता है। कहता है “जी नहीं मैं राजस्थान से हूँ…”

मुझे बात सम्हालनी पड़ती है, “राजस्थान तो हवेली, महलों वाला प्रदेश है, क्या बात है…. आप वहाँ भी अच्छा कर रहे हैं।” 

“धन्यवाद सर ! ये आपके रूम की चाबी।” वह चाबी मुझे थमाते हुए कहता हैं।  


24.12.2018(478km/2285km) 08.10AM 


अब चलते हैं, दो ऐतिहासिक जगहों पर पहला सूर्य मंदिर मोढेरा और दूसरी पाटण स्थित वल्ड हेरिटेज रानी की वाव की ओर। यदि आपको अपनी पत्नी के लिए साड़िया खरीदनी हो तो “पटोला साड़ी म्यूजियम” भी हमारी राह देख रहा है।

10.00AM 

अहमदाबाद से निकले हुए दो घंटे हो चुके हैं। अभी सुबह के दस बजे हैं। हर बार मुझे रास्ते में कुछ नायाब चीजें नजर आ ही जाती हैं जो मेरी योजना में नहीं होती। तो कार से जाने के अपने ही फायदे हैं। आपका सफर ट्रेन या बस मे फास्ट फारवर्ड हो जाता है और हवाई जहाज में तो पूरा सफर ही गायब हो जाता है। तो जब मैं सूर्य मन्दिर मोढेरा जा रहा था, तब रास्ते में एक मन्दिर पड़ा। यह “माँ मोदेश्वरी मातुंगा देवस्थान” था। बाहर से तो प्रवेश द्वार के अलावा कुछ और नजर नहीं आया क्यों कि मन्दिर चारो ओर से परकोटे से घिरा था। दर्शन की लालसा लिये जब मैने भीतर प्रवेश किया तो पाया यहाँ तो एक विशाल कैम्पस है, जहाँ यात्रियों के ठहरने और उनके भोजन की व्यवस्था भी है। यह गुजरातियो के तीर्थ स्थान सा लगा। बहुत से गुजराती वहाँ ठहरे हुए थे। कथा चल रही थी। मंदिर में उपर जाने के लिये लिफ्ट लगीं थी। गर्भ गृह में आलय देखते ही बनता था। भीतरी सज्जा मन मोह लेने वाली थी। पास के प्रकोष्ट में एक देवालय में देवी की मूर्ति स्थापित की गई थी। यह पूर्ण स्वर्ण से बनीं थी और देवालय की आंतरिक सज्जा सोने के पत्र से की गई थी। मुझे पहले इस मन्दिर की कोई जानकारी न थीं बस रास्ते मे पड़ने के कारण मैं इसमें प्रविष्ट हो गया था...





         
जब मैंने मन्दिर के व्यवस्थापक से कुछ और जानकारियाँ खंगालने का यत्न किया तो उन्होंने बतलाया यह ट्रस्ट द्वारा निर्मित है और भक्तों का जत्था यहाँ दर्शन को आता है। एक या दो दिन ठहर कर वे लोग और जगह बनें इसी तरह के स्थलों की और निकल जाते हैं। इसका अर्थ यह हैं कि विभिन्न ट्रस्ट ने इस तरह के संस्थान का एक जाल सा बिछा दिया है और गुजराती लोग एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते रहते हैं।

10.25AM 

चलिये अब मोढेरा सूर्य मंदिर चलते हैं। जो यहाँ से बस दो मिनट की दूरी पर है और अहमदाबाद से दो घंटो की दूरी पर है। यह गुजरात के पाटण नामक स्थान से 30 किलोमीटर दक्षिण की ओर “मोढेरा” नामक गाँव में प्रतीष्ठित है। यह सूर्य मन्दिर भारतवर्ष में विलक्षण स्थापत्य एवम् शिल्प कला का बेजोड़ उदाहरण है। 900 वर्ष पूर्व सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम द्वारा इस मन्दिर का निर्माण किया गया था। वर्तमान समय में इस मन्दिर में पूजा करना निषेध है। कहा जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने मंदिर को तोड़ कर खंडित कर दिया था।









सुर्य मन्दिर की अद्भुत शिल्प कला पिछले नौ सो वर्ष से भूकंप और सदा परिवर्तित होने वाले मौसम की मार झेलते हुए अभी भी अक्षुण अपरिवर्तित है एवं यह मन्दिर पर्यटको के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। खैर  कुछ और नायाब चीजों को देखते हैं। सूर्य मंदिर के पश्चात अब 30 किलोमीटर दूर पाटण में स्थित वल्ड हेरिटेज रानी की वाव (रानी की बावड़ी ) देख कर हम भुज की ओर निकल जाएंगे।

11.45PM 

रानी की वाव भारत के गुजरात राज्य के पाटण में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ ) है। इस चित्र को जुलाई 2018 में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ₹100 के नोट पर चित्रित किया गया था तथा 22 जून 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया। पाटण को पहले 'अन्हिलपुर' के नाम से जाना जाता था जो गुजरात की पूर्व राजधानी थी। कहते हैं कि रानी की वाव (बावड़ी) वर्ष 1063 में सोलंकी शासन के राजा भीमदेव प्रथम की प्रेमिल स्‍मृति में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने बनवाया था. सोलंकी राजवंश के संस्‍थापक मूलराज थे। रानी उदयमति जूनागढ़ के चूड़ासमा शासक रा' खेंगार की पुत्री थीं।







सीढ़ी युक्‍त बावड़ी में कभी सरस्वती नदी के जल के कारण गाद भर गया था। यह वाव 64 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा तथा 27 मीटर गहरा है। यह भारत में अपनी तरह का अनूठा वाव है। वाव के खंभे सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं. वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। सात मंजिला यह वाव मारू-गुर्जर शैली का साक्ष्य है। ये करीब सात शताब्दी तक सरस्वती नदी के लापता होने के बाद गाद में दब कर यह एक मैदान हो गया था जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वे ने वापस खोज निकाला। दरअसल सभ्यता के अंत के पश्चात एक लम्बा काल खंड हर तरह की सभ्यता से रिक्त रहा होगा और यह इतिहास की नायाब धरोहर भूमी में दब कर लुप्त हो चुकी होगी। बिल्कुल यहीं घटना साँची के बोद्ध स्तूपो के साथ घटित हुईं जिन्हें बाद में अंग्रेजो ने खोज निकाला। आप विचार किजिये रानी की वाव और साँची के स्तूपो का जब निर्माण हुआ होगा तब कितनी समृद्धि और चहल पहल रहीं होगी। 

1.20PM 

रानी की वाव से निकल कर "पटोला साड़ी म्यूजियम" पर रूकते हैं। यहाँ आप साड़ियाँ खरीद भी सकते हैं। आखिर आप इतनी दूर आऐ हैं तो इस स्थान की याद स्वरूप कुछ तो ले ही जाऐगे न ? तो चलिये भीतर चलते हैं। 

इस दुकान मे प्रविष्ट करते ही कुछ हाथकरघे नजर आते हैं। एक पर आधी बुनी हुई साड़ी लगीं हुई है। म्यूज़ियम का एक व्यक्ति साड़ी एवं इसे बुनने की कला के सम्बन्ध में कुछ रोचक जानकारियाँ देता है। यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही है। परिवार के सदस्यों को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। दुनिया में यह कला किसी ओर देश के पास नहीं है फिर गाईड ने जापान और चाईना के बुनकरो द्वारा चुनौती ले कर जो साड़ियाँ बुनी उन साड़ियों को दिखाते हुए कहा, 

“वे भी इन साड़ियों को बुन नहीं सके और बुनाई और रंगाई की गलती से डिजाइन में गड़बड़ी कर बैठे...”

“इसे बुनने में कितना समय लगता है ?” 

"एक से दो वर्ष। " 

 “और एक वर्ष में कितनी साड़िया बुनते हैं आप लोग ?” 

“जी सारे परिवार के ही लोग होते है बाहर का कोई नहीं होता। एक वर्ष में कोई तीन या चार साड़ी ही बुनी जाती है।”

“बस ! और इस साड़ी की कीमत क्या है।?”

“जी देखिये ! जो साड़ी आपने पंसद की है उसकी कीमत हैं ढाई लाख. वो भी आपको अभी आदेश करने पर साल या देड़ साल बाद मिलेगी।"

“अच्छा यह बताईये इन साड़ियों का इतना महंगा होने का क्या कारण है ?” 

जी देखिये आम साड़ी बुनने के बाद उस पर छापे से डिजाइन बनाई जाती हैं मगर हम धागों को डिज़ाइन के अनुसार रंगते हैं और धागे को बुनाई कर ठीक उस जगह बैठाते हैं जिससे डिजाइन तैयार होती है। धागे का जरा भी आगे पीछे रंगना या बुनाई की गड़बड़ी से डिजाइन गड़बड़ हो जाएँगी।

 “और ये फोटो जो लगे हैं ?

“ये सब हमारे ग्राहकों के हैं। अम्बानी, अमिताभ बच्चन, सोनिया गांधी, स्मृति ईरानी, शीला दीक्षित  जैसी हस्तियाँ हमारी ग्राहक रह चुकी हैं।” गाइड ने अपनी बात ख़त्म की।

मेरे विचार से इन साड़ियों पर की जाने वाली इतनी मशक्कतों का कारण यह है कि, जैसे एक चित्रकार की कला उसकी एकाग्रता, कल्पनाशीलता एवं कौशल का परिचायक होती है  ठीक उसी प्रकार  इन  साड़ियों द्वारा तन ढकना तो इसका एक अन्य उपयोग है, मुख्यतः  ये बरसो बरस के कौशल, परिश्रम और भारतीय कला का प्रतिनिधित्व करती हैं।  लोग इसकी क़द्र करते हैं और परिश्रम की  कीमत भी  देते हैं।”

यहाँ हमे यह खयाल रखना है कि गाइड की बात सुनकर हमें अपने चेहरे का रंग बदलने नही देना है और जिस उत्साह से हमने भीतर प्रवेश किया था उसी तरह बाहर आना है और यहीं  दर्शाना है  कि वो तो साड़िया हमें पसंद नही आई वरना दो चार तो हमारे लिये मामूली बात है। हाँ मगर आप बेशक खरीद भी सकते हैं, मुझे आपके उपर पूरा भरोसा है, मगर यह इस बात पर निर्भर करता कि आप अपनी पत्नी को कितना प्यार करते हैं ?

खैर यह तो मजाक की बात थीं।हमे शाम तक भुज पहुँचना हैं

तीसरे और अंतिम भाग में पढ़िए कच्छ का सफ़ेद रेगिस्तान, मांडवी के पारम्परिक वस्त्र,  

द्वारका...और भी बहुत कुछ...तो साथ रहिएगा...
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