भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग 
अद्भुत अद्वितीय 


 

पुणे के प्रवास ने एक नए खूबसूरत शहर को देखने का मौका दिया। महसूस हुआ पूना सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण एक समृद्ध शहर है।

विनीता बेन के नूतन नवीन गृह प्रवेश कार्यक्रम में आनंद पूर्ण शिरकत करने एवं आतिथ्य सत्कार की अद्भुत परंपरा का स्वाद चखने के पश्चात तय हुआ भीमाशंकरजी के दर्शन कर लिए जाए फिर पता नहीं कब वक्त मिले । पुणे से सिर्फ तीन घंटों की दूरी पर ही तो स्थित है बारह ज्योतिर्लिंगों में एक प्राकृतिक वातावरण से समृद्ध , अद्भुत अद्वितीय हम सब के आराध्य का पवित्र स्थान भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग।

ट्रैफिक पुलिस ने मंदिर से छह किलोमीटर पहले ही हमारी कार को रोक दिया।


“आप आगे नहीं जा सकेंगे। कार यहीं पार्क कर पैदल जाना होगा मगर लौटने के लिए बस सुविधा उपलब्ध रहेगी।”


पता करने पर ज्ञात हुआ संपूर्ण महाराष्ट्र से युवान तीन दिन के ट्रेक "मोहिम" पर निकले हैं।


खैर कोई बात नहीं शिव जिस भी तरह दर्शन दे, मंजूर है।


सो कार वही पार्क की। चारों ओर बहुत भीड़ थी। बीस तीस कारें पहले ही खड़ी थी। जरूरत का समान ले कर बाकी समान यानी दो सूटकेस, खाने का टिफिन जो सचित बेन ने दिया था, वैगेरह वैगरह कार में ही छोड़ कर और अभिषेक में विलम्ब न हो जाए इस जल्दबाजी में आगे के दोनों शीशे बंद करना भूल कर हम ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए चल पड़े भीमाशंकर मंदिर की और…


“हम्मम क्या पूछा आपने ??? समान का क्या हुआ ?”


“समान ?? अरे !! वह तो लौटने पर ही मालूम होगा न !! ”


हां तो मैं कह रहा था, सुबह पांच बजे पुणे से निकलने पर तय यह हुआ अभिषेक होने तक उपवास किया जाए। वैसे भी उपवास शरीर को स्वस्थ रखने की एक प्रकिया है। सामने था छह किलोमीटर का सफर। यूथ हॉस्टल के कई ट्रेकिंग प्रोग्राम में शिरकत करने के कारण यह दूरी हम दोनों के लिए सामान्य थी। हम दोनों यानी मैं और नीलम।


पुणे से भीमाशंकर तक 123 किलोमीटर का रास्ता तो कल्पना से भी बेहतर है। शहर छोड़ते ही ट्रैफिक से मुक्ति मिल जाती है। जैसे जान में जान आ जाती है। घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए नदियां, पहाड़ और जंगल शरीर में ऊर्जा का संचार करने लगते हैं। 







भीमाशंकर मंदिर के पहले पुलिस ने छह कार पार्किंग स्थल बनाए हैं। भीड़ बढ़ने के साथ ही पुलिस इन स्थलों पर गाड़ियां रोकना आरंभ कर देती है। सौभाग्य से आज पहले के पांच पार्किंग स्थल फुल होने के बाद हमें अंतिम पार्किंग पर रोका गया। सौभाग्य इसलिये कि छह किलोमीटर ट्रेकिंग करने का अवसर मिला। मनोहारी वन से गुजरते हुए, महादेव के ध्यान में, वरना मैं इस निर्जन अरण्य में रुकता ही क्यूं ?


रास्ते भर युवाओं के जत्थे मिलते रहे। कुछ जा रहे थे और उनमें से कुछ अति उत्साही युवान दर्शन लाभ ले कर लौट भी रहे थे। कुछ मराठी में भजन करते जा रहे थे। कुछ युवक हमारे साथ ही चलने लगे। मैंने पूछा,


" ज़रा अपने बारे में और इस यात्रा के बारे में बतलाइए।"

उनमें से एक ने कहा,


"संपूर्ण महाराष्ट्र से हम लोग सर्वप्रथम शिवाजी निर्मित दुर्ग पर एकत्र हुए और वहां से पैदल यहां आए हैं। यात्रा का खर्च खाने और सोने की व्यवस्था स्वयं करनी है। तीन दिन के इस कार्यक्रम में हम सभी खुले असमान तले सोते हैं।"



"यह कार्यक्रम 29 जनवरी से 1 फरवरी तक चलेगा।"

उसने आगे कहा।



युवाओं को इतिहास और संस्कृति से जोड़ने का यह अनोखा प्रयास था।


बातें करते करते हम मंदिर पहुंच चुके थे। सुबह के इस वक्त लाइन ज्यादा लंबी नहीं थी। बहुत से दर्शनार्थी लौट भी रहे थे, किंतु अभिषेक में कुछ वक्त तो लगना ही था। सो हमने ताज़ा गन्ने का जूस लेने का निश्चय किया।





लीजिए हम सीढ़ियों से उतर रहें हैं। दोनों तरफ दुकानें और हम मुख्य मंदिर के बिलकुल करीब आ जाते हैं जहां से एक परिक्रमा करते हुए प्रवेश करना है।


मंदिर की दीवारों पर शिव स्तुति लिखी हुई है। कुछ इस तरह कि पढ़ते जाइए और परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ते जाइए।


कैलासराणा शिवचंद्रमौळी । 

फणींद्र माथां मुकुटीं झळाळी ।

कारुण्यसिंधू भवदुःखहारी । 

तुजवीण शंभो मज कोण तारी ॥


थकान लुप्त हो चुकी है और मन आनंद से भर चुका है। कुछ ही देर में हम मुख्य मंदिर में आ जाते हैं। वहां बहुत से पंडित बैठे हुए हैं। सरकार ने ट्रस्ट बना दिया है। प्रत्येक पूजा की फीस तय है। रसीद कटती है। पैसा सरकारी ख़जाने में जमा होता है। सब कुछ व्यवस्थित है। हमने अभिषेक की रसीद ले ली है। पंडितजी ने कुछ देर इंतज़ार करने को कहा है। एक बार में पांच यजमान एक साथ अभिषेक करेंगे। हम मंदिर की पॉजिटिव वाइब्रेशन महसूस करते हुए इंतजार को अपना सौभाग्य समझते हैं।


कुछ देर बाद पंडित जी गर्भ गृह में आने का इशारा करते हैं। पांचों यजमानों ने अपनी अपनी जगह सम्हाल ली है। आनंद की, परम सौभाग्य की वो घड़ी आ चुकी है। हम अपने आराध्य महादेव के एक रूप, रुद्रदेव के ठीक सामने हैं। देव अपने भक्तों से घिरे हैं। वे स्नेह बंधन में बंधे हैं।


अभिषेक आरंभ हो चुका है। पंडितजी जी जल अभिषेक हेतु जल से भरे घड़े हमारे हाथों में थमाते जा रहें हैं।


यह सब अदभुत, महाअदभुत है। पिंडी से चांदी का कवच हटा दिया गया है। ऐसा सिर्फ दिन में एक बार होता है। फिर घिसा हुआ चंदन दिया गया। इसके पश्चात पांच द्रव्य घी, दूध, शहद, मिश्री और दही और साथ में पंचामृत। हर चढ़ावे के साथ पंडित जी मंत्रों का जाप करते हैं। मेरे पास एक युवा जोड़ा बैठा है । वह लखनऊ से है। वे कुछ ज्यादा ही जोश में हैं। अभिषेक काफी देर चलता है। न पंडितजी को जल्दी है न हमें और न ही हमारे आराध्य को। और अंत में फल फूल और प्रसाद चढ़ाने के साथ ही संपन्न होता है। कहते हैं, महादेव संपूर्ण नकारात्मकता हर लेते है। तो एक ताज़गी सी महसूस होती है।


अभिषेक के पश्चात हम गर्भगृह से बाहर आ चुके हैं। मुझे जो भी पूजन सामग्री बताई गई थी प्रसाद समेत वह सब महादेव को चढ़ा दी गई है।


मुझे पूजा के नियम मालूम नहीं हैं। मैं सकुचाते हुए पंडित जी से प्रसाद की इच्छा करता हूं। पंडितजी कहते हैं, 


“यहां सब कुछ महादेव याने रुद्रदेव पर अर्पित कर दिया जाता है। क्या देना है यह देव के देव स्वयं तय करेंगे।"


कोई बात नहीं इतनी संपूर्णता, इतनी शांति, इतना आनंद कभी महसूस नहीं हुआ। यह सब महादेव का प्रसाद नहीं तो और क्या है ??


बाहर आने के पश्चात अब सर उठा कर अब मंदिर के चारों ओर देखने का वक्त मिला तो पाया यह मंदिर तो जैसे पहाड़ों की गोद में निर्मित है। चारों ओर जंगलों से घिरा हुआ। इससे मंदिर की खूबसूरती बढ़ जाती है। भीमाशंकर से कुछ किलोमीटर पहले से ही ठहरने के लिए होटलों का क्रम आरंभ हो जाता है। जिसमें महाराष्ट्र टूरिज्म की एक होटल भी शामिल है। मंदिर से लगे हुई भी कुछ कमरे हैं जो दिन के हिसाब से किराए पर मिल जाते हैं। भागदौड़ से भरी ज़िंदगी जिस को हमने अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया है वह तो जैसे यहां आते ही रुखसत हो जाना चाहती है, लेकिन उसके लिए एक दो दिन का ठहराव अपरिहार्य है। फिर तृप्त हो कर प्रस्थान किया जाए।



भीमाशंकर मंदिर यहीं समाप्त नहीं होता। आगे जंगल के भीतर सुरम्य वातावरण में छुपे और भी आध्यात्मिक स्थान हैं। मुझे उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की याद आ जाती है। अनंत सत्ता के स्वामी जंगलों और पहाड़ों पर एकांत में रहने के आदी हैं उनका जो बेहद प्रिय स्थान है वह केदारनाथ है। लेकिन उज्जैन में हमने उन्हें मकानों, दुकानों और इमारतों से घेर दिया है। बेशक हुकूमत ने परिसर का विस्तार किया है लेकिन मंदिर तक पहुंचने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। वह भीमाशंकर जितना आसान नहीं है। मुश्किल तो केदारनाथ तक पहुंचना भी है लेकिन वह महादेव की इच्छा से निर्मित यात्रा का वह एक अनिवार्य भाग है…जो भक्तों को आनंद से परिपूर्ण कर देता है... मुझे अब विश्वास हो चला है, भोले को यह स्थान बहुत भाता होगा...खैर...


भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के सह्याद्रि पर्वत पर स्थित छठा ज्योतिर्लिंग है। यहां महादेव ने भीमा नमक दैत्य को मोक्ष प्रदान किया था। सो नाम हुआ भीमाशंकर।


वापस चलने का वक्त हो चला है। अब तक दर्शनार्थियों की लाइन बहुत लंबी हो चुकी है। प्रातः दर्शन की बात ही कुछ और थी। 


दोपहर के दो बजने को हैं। अब भूख लगने लगी है। मन्दिर परिसर में खाने की बहुत सी होटलें हैं, किंतु साहस नहीं कर पाते। आज चार सौ किलोमीटर का सफर तय करना है। फिलहाल कुछ ताज़े फलों से काम चल जाएगा। सुबह संचिता बेन के घर से निकले थे। सब्जी पराठे दे दिए थे। सो काफी है।


जैसा की पुलिस ने बताया था, एक बस हमें हमारी पार्किंग तक छोड़ देती है। दोपहर के तीन बज चुके हैं।


इस वक्त तक भीड़ कई गुना बढ़ चुकी है। पार्किंग स्थल सैकड़ों कारों से भर चुका है।


मैंने देखा कार के अगले दोनों कांच पूरे खुले है। लेकिन आश्चर्य की बात है भीतर रखा सारा समान वगैरह वैसा का वैसा ही व्यवस्थित रखा है। पता नहीं कितने लोग गुज़रे होंगे पर किसी ने हाथ भी नहीं लगाया। आज के ज़माने में मैं इसे चमत्कार मानता हूं। 


अभी के लिए इतना ही…


‘कुछ पर्यटन कुछ विचार’ में आगे आपके लिए और भी बहुत कुछ है।


आनंदित रहते हुए ईश्वर में आस्था बनाए रखें।


सदैव कुछ अच्छा पढ़ते रहें।✍️✍️


महादेव की कृपा आपको प्राप्त हो।🚩🚩


आपका धन्यवाद…


।। हर हर महादेव... नर्मदे हर हर ।।



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