श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग...
श्रीशैलम मल्लिकार्जुन
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अब गाउजीबावली आ चुका है यह क्षेत्र प्रचुर हरियाली से भरी हुई नई बसाहट है।हैदराबाद के नवाब ने इस क्षेत्र में सर्वप्रथम महाराष्ट्रीयन लोगों को बसाया था। पास में स्थित फाइनेंस स्ट्रीट एक टेकपार्क है जो हैदराबाद को एक नया रूप प्रदान करता है। ताज़गी से भरी यह जगह जीवन यात्रा आरम्भ करने वाले युवानों यानी नए लोगों को समर्पित है। यहां युवान अपनी योग्यतानुसार काम पा सकते हैं।पानी, पैसा और योग्यता अपनी राह स्वयं बना लेते हैं। प्राइवेट कंपनी जनरल कैटेगरी वालों के लिए समर्पित है और कॉलेज से निकलने वाले बच्चों को थकाने वाली सरकारी व्यवस्था से बचाते हुए तुरंत रोज़गार मुहैया करवाती हैं। वैसे भी इन संस्थानों ने सरकार के समानांतर व्यवस्था विकसित कर ली है। बस बुद्धि और परिश्रम के साथ आगे बढ़ने की ललक चाहिए। तो वही एस.सी.एस.टी. आते हैं जिनमें पर्याप्त योग्यता होती है। बाकी के लिए सरकार ने अपने दरवाज़े खोल ही रखे हैं।
चिलकुर बालाजी
अभी कुछ समय है तो सोचा हैदराबाद के एक प्राचीन मंदिर चिलकुर बालाजी के दर्शन कर लिए जाए। रोड द्वारा या हवाई जहाज द्वारा आखिर आप भी हैदराबाद से ही श्रीशैलम के लिए जाएंगे तो समय हो तो हैदराबाद में देखने के लिए बहुत कुछ है। मैं नहीं चाहता आप ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध इन विशेष स्थानों को छोड़ कर आगे बढ़ जाएं। समय हो तो संगमरमर से निर्मित बिरला मंदिर 1562 में निर्मित आज भी जल से लबालब भरा हुसैन सागर भी देख सकते हैं।
हैदराबाद में 14 वीं शताब्दी में पूर्ण हुआ चिलकुर बालाजी मंदिर, तेलंगाना के रंगारेड्डी ज़िले में उस्मान सागर के तट पर स्थित भगवान बालाजी का एक प्राचीन हिंदू मंदिर है । यह हैदराबाद ज़िले (जो पहले रंगारेड्डी ज़िले में था) के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है, जिसका निर्माण भक्त रामदास के चाचा मदन्ना और अक्कन्ना के समय में हुआ था । बालाजी दर्शन के दौरान, भक्त प्रार्थना की सामान्य रस्में निभाते हैं, जिसमें आंतरिक मंदिर की 11 परिक्रमाएँ भी शामिल हैं , और मन्नत मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने पर भक्त गर्भगृह की 108 परिक्रमाएँ करते हैं। भक्तों की अधिकांश मनोकामनाएँ वीज़ा से संबंधित होती हैं, इसलिए चिलकुर बालाजी को 'वीज़ा' बालाजी भी कहा जाता है।(इंटरनेट से साभार)
मंदिर में सिर्फ तुलसी की माला चढ़ाई जाती है जिसे बाद में मंदिर के पीछे बनी गोशाला में गायों को भोजन के रूप में दे दिया जाता है। मैं सोच रहा था उन गायों का दूध तो बिल्कुल औषधि ही होगा।
श्रीशैलम
इसके पश्चात अब ईश्वर द्वारा उपहार में प्राप्त इस जीवन हेतु श्रीशैलम चल कर आभार, धन्यवाद व्यक्त कर लिया जाए।
हैदराबाद से श्रीशैलम की दूरी दो सौ पच्चीस किलोमीटर है। जिसे साढ़े चार घंटों में तय किया जा सकता है। यह गूगल एवं टैक्सी वालों के अनुसार है, किंतु आप पांच या छह घंटे ले कर चलें तो सफ़र का आनंद भी उठा सकते हैं।
मार्ग में 68 किलोमीटर पर मिसिगुंडी में मसाम्मा देवी का अति प्राचीन मंदिर रुकने पर मजबूर कर देता है। जिसे बंजारा जाति के लोगों ने बनाया है। मसाम्मा देवी काली का ही अवतार है। यह मंदिर स्थापत्य कला का अनोखा प्रमाण है, जो आपका ध्यान बरबस ही खींच लेता है।
चलिए यात्रा ज़ारी रखते हैं। आगे श्रीशैलम का विस्तार सत्तर किलोमीटर तक है। जो आपको शहरों की भागदौड़ से मिली उकताहट से मुक्त करता है। रास्ता सुरम्य घाटों के कई नयनाभिराम स्तरों को पार करते हुए मंदिर तक पहुंचता है।
श्रीशैलम आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है और भगवान शिव के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है । यह ज्योतिर्लिंग द्रविड़ शैली में निर्मित एक प्राचीन मंदिर है जिसमें विजयनगर वास्तुकला के नमूने देखने को मिलते हैं।
कितना प्राचीन है मंदिर ?
श्रीशैलम में "श्री भ्रमरम्बा मल्लिकार्जुन" मंदिर एक प्राचीन स्थल है जिसका प्राचीनतम साक्ष्य शिलालेखों से पता चलता है। यह मंदिर देवी पार्वती को समर्पित महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह स्थल कई युगों से एक पवित्र स्थान रहा है और इसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है।
दूसरी शताब्दी में सातवाहन वंश के शासनकाल में अस्तित्व में आया था। इस बात की पुष्टि शिलालेखों से होती है कि इस समय मंदिर का अस्तित्व था।
तीसरी शताब्दी में प्राचीन ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता हैं। । बाद के राजवंशों ने इस परिसर में निर्माण और जीर्णोद्धार किया।
14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत महत्वपूर्ण परिवर्धन और आधुनिक जीर्णोद्धार हुए। राजा हरिहर प्रथम और मंत्री चंद्रशेखर ने निर्माण में योगदान दिया।
रेड्डी साम्राज्य: रेड्डी साम्राज्य के शासक, जो शिव के भक्त थे, ने मंदिर तक जाने के लिए रास्ते और मंडप (हॉल) का निर्माण कराया।
17वीं शताब्दी में मंदिर का उत्तरी गोपुरम (टॉवर) मराठा शासक छत्रपति शिवाजी द्वारा बनवाया गया था। इस तरह दूसरी शताब्दी से आज तक समय समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा है।
तो साहब ! श्रीशैलम पहुंच कर आंध्र प्रदेश टूरिज्म की होटल का कमरा ऑनलाइन बुक किया, जो केवल ऑनलाइन ही बुक होता है, बेशक इकोनॉमी है लेकिन कल्पना से भी बेहतर है ।
आश्चर्य की बात है सावन के इस माह में भी भीड़ संतुलित है। मंदिर परिसर रात तीन बजे से शिव स्तुति से गूंज उठता है।
सुबह के पांच बजे हैं। हम मंदिर परिसर के वी. आय. पी. लाउंज में बैठे हैं। हर कुछ देर में कुछ लोग उठते हैं और भीतर प्रवेश कर जाते हैं। पांच पैंतालीस को हम मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं। द्वारपाल को कार्ड दिखाते हैं,
“आपका स्लॉट तो सुबह छह का नहीं शाम का है। आप शाम छह तक आइए।”
यह सुन कर मेरे चेहरे पर परेशानी के भाव छलक आए। मैंने कहा,
“लेकिन मैंने तो सुबह छह बजे का स्लॉट बुक किया था। इससे तो मेरा सारा कार्यक्रम ही बिगड़ जाएगा। "
“नहीं आपने शाम का स्लॉट बुक किया है कंप्यूटर गलती नहीं करता, और इसके साथ आधार की कॉपी भी नहीं है।”
यह तो में भी जानता हूँ, कंप्यूटर गलती नहीं कर सकता, मगर गलती तो चुकी है।
श्री शैलम से जबलपुर की दूरी दस सौ त्रियासी किलोमीटर हैं । अब हम राखी तक घर नहीं पहुंच सकते।
आधार की कॉपी रूम पर है। ले कर फिर मंदिर के गेट तक पहुंचते है। गेट पर अपनी विशालकाय काया लिए मंदिर सुप्रिटेंडेंट खड़ा है। मैं महादेव के दर्शन को व्याकुल हूं। मुझे सुप्रिटेंडेंट में भी महादेव का नंदी दृष्टव्य होता है।
उसने हिंदी तेलगु मिक्स करते हुए मुझसे कहा,
“ठीक है, दस बजे आना। मैं अभिषेक के लिए अंदर जाने देता।”
हम कुछ देर फिर वी. आय. पी. लाउंज में बैठ गए। यही कोई दस मिनट बैठे होंगे सुबह के साढ़े छह बजने को है दस बजने में तो अभी चार घंटे हैं। तभी मैं एक निर्णय लेता हूं।हम फिर मुख्य द्वार पर पहुंचे।
सुप्रिटेंडेंट वहीं बैठा था। मैंने विनम्रता से कहा,
“सर अभिषेक के लिए मेरी दी गई राशि को दान समझ लीजिएगा और मुझे सिर्फ दर्शन की अनुमति दे दें, शायद महादेव की भी यही इच्छा है।”
मुझे महसूस हुआ यहां सुप्रिटेंडेंट ही सर्वेसर्वा है। अब यही सारे फैसले लेने वाला है।
उसने मेरे बेहद अजीब प्रस्ताव पर गौर किया फिर अंदर गर्भालय में आसीन एक अन्य पंडित से वाकी टाकी पर बात की। उसकी भाषा मुझे ज़रा भी समझ न आई। बात करने के बाद उसने हमें भीतर प्रवेश करने को कहा। मैंने चैन की श्वास ली चलो अभिषेक ना सही फिलहाल महादेव के दर्शन ही सही।
भीतर मैने देखा सैकड़ों लोग दर्शन की प्रतिक्षा में खड़े थे।
“ये बनियान उतारो। यहां नहीं चलता।”एक पंडित ने कहा।
मैंने उसके आदेश का पालन करते हुए बनियान उतार कर उपरी अर्धभाग को श्वेत गमछे से लपेट लिया ।
“अभिषेक के लिए इधर से जाना।” उसने आदेश दिया।
“लेकिन हम तो दर्शन…!!.”
“अभिषेक के लिए इधर से जाना।” उसने फिर आदेश दिया।
आगे जाने पर एक हमें मंदिर प्रबंधन की और से एक बैग दिया गया, जिसने प्रसाद, तिलक , और वस्त्र थे।
ये क्या ! हम तो सीधे गर्भालय को पहुंच गए। अभिषेक के लिए। सम्मुख स्वयंभू शिव अपने सौम्य अवतार में मौजूद हैं। तब मैंने जाना ब्रह्मांड के स्वामी अपने भक्तों के लिए किस तरह व्यवस्था करते हैं।
बारह ज्योतिर्लिंग में एक श्रीशैलम इसलिए भी महत्वपूर्ण है यहां शिव अपने परिवार के साथ मौजूद है। तो हुआ क्या था ? कहानी क्या थी? आइए इसे ज़रा समझे।
जब अपने पुत्रों के सम्मुख महादेव ने शर्त रखी, संसार जगत की परिक्रमा जो पहले करेगा उसका विवाह पहले होगा। तो कार्तिकेय संसार की परिक्रमा के लिए निकल गए और गणेश जी वहीं बैठे विचार करते रहे।
"क्यों गणेश तुम्हे विवाह नहीं करना ?" मां पार्वती ने पूछा।
यह सुन कर गणेशजी उठे और अपने मां पिता याने शिव पार्वती जी की तीन परिक्रमाए कर नतमस्तक हो उनके सम्मुख खड़े हो गए।
"लीजिए मां, हो गई संसार जगत की परिक्रमा। आप ही ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, आप ही सर्वेसर्वा हैं। आपके सिवाय और कौन सी दुनियां है ?"
अपने विद्वान पुत्र का जवाब सुन कर शिव जी ने पार्वती जी की और देखा। तब पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए शिव जी से कहा,
“बात तो सच है...”
इस तरह कार्तिकेय हार गए और गणेश जी का विवाह पहले हो गया। तब रूष्ट हो कर कार्त्तिकेय कैलाश छोड़ कर श्रीशैलम के इस दुरूह एवं भीषण पर्वत पर तपस्यारत हो गए। उन्हें मनाने शिव अपने रुद्र रूप में एवं पार्वती अपने भ्रमराम्बा देवी के रूप में इस पर्वत पर आए और अपने पुत्र को मनाया।
परिसर में 1300 ईस्वी याने सात सौ वर्ष पूर्व निर्मित कई अन्य मंदिर अभी भी अपने श्रेष्ठ वास्तुकला के साथ विद्यमान हैं।
कार्तिकेय तो कैलाश चलने को माने किंतु उन्होंने शिवजी से अपने रूप को यही स्थापित करने का निवेदन किया। इस तरह श्रीशैलम का शिवलिंग स्वयंभू है।
इसके अलावा यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में एक है जहां देवी की गर्दन गिरी थी।
प्रतिदिन शाम को शिव पार्वतीजी का विवाह होता है। दर्शनार्थी विवाह रस्म के साक्षी हो सकतें हैं।
1.सर्वप्रथम मुख्य मंदिर से 2 किमी पूर्व में स्थित है साक्षी गणेश।
2.बाल धारा (रोप वे द्वारा)
3.पांच धारा दर्शन
4.हटकेश्वर मंदिर
5.मलिकार्जुन मंदिर





























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