बरगी, भेड़ाघाट और जीवाश्म...


बरगी, भेड़ाघाट और जीवाश्म....




 ।। त्वदीय पाद पंकजं नमामी देवी नर्मदे ।।



1...बरगी


कहते हैं नर्मदा जी को बाँध पाना किसी मानवीय शक्ति के बस में नहीं हैं, परन्तु जब कोई काज मानव जाति के भले के लिये हो तो मानव द्वारा स्नेह से किये अनुरोध को विनम्रता से स्वीकार कर माँ नर्मदा अपने वेग को बरगी बाँध पर कुछ देर के लिये विराम दे देती हैं।


जबलपुर से तीस किलोमीटर नागपुर रोड पर बरगी मे नर्मदा नदी पर बना इन्जीनियरिंग का यह अद्भुत नमूना है। जो नर्मदा नदी के पावन जल को नहरों के द्वारा प्यासे खेतो की ओर मोड़ देता है। जब यही जल बिजली निर्माण करने वाले कारखाने से गुजरता हैं तब कई घर रोशनी से जगमगा उठते हैं।


नर्मदा नदी पर बने 30 प्रमुख बांधों की श्रृंखला में  बरगी में नर्मदा नदी पर बना यह प्रथम बाँध है। बांध निर्माण का काम 1974 में शुरू हुआ और 1990 में पूरा हुआ। इसकी ऊंचाई 69 मीटर और लंबाई 5.4 किमी है। पानी 422.76 मीटर तक भरने की पश्चात आवश्कतानुसार बाँध के 21  गेट खोले जा सकते हैं।  बरगी बांध द्वारा बरगी मोड़ परियोजना और रानी अवंतीबाई लोधी सागर परियोजना नाम की दो प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ विकसित की गई हैं। जिससे कुल सिंचाई क्षमता बढ़कर 4,370 वर्ग किलोमीटर है। जब बांध अपनी पूरी क्षमता से भर जाता है, तब  हाइड्रो पावर जेनरेशन प्लांट  90 मेगावाट बिजली पैदा करता है। प्रत्येक 45 मेगावाट की दो स्वतंत्र इकाइयाँ स्थापित की गई हैं। 


नर्मदा मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी नदी है, जो अमरकंटक से अपनी यात्रा का आरम्भ कर  पश्चिम की ओर बहते हुए अरब सागर से मिल कर अपनी यात्रा को विराम देती है। नदी की कुल लंबाई 1312 किमी है, ( मध्य प्रदेश में 1072 किमी शामिल है।)




इसके एक सिरे पर थोड़ी ही दूर मनोहर पहाड़ी पर एक भव्य मन्दिर में शिव जी विराजमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे अपनी पुत्री नर्मदा को सतत प्रवाहित रहने का आशीर्वाद दे कर  उसके सानिध्य में प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं, तो दूसरे किनारे मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा निर्मित रिसोर्ट हैं. जहाँ ठहरने नाश्ते और खाने की व्यवस्था है। एक क्रूज जिसमें दो या तीन दिन रूक कर नर्मदा जी के पावन साथ का आनंद लिया जा सकता है। एक और क्रूज जिसमें पैतालिस मिनट तक नर्मदा दर्शन किया जा सकता है। यह आनंद देने वाला अनुभव है। इसके अलावा सैर करने को स्पीड बोट और अन्य छोटी बड़ी बोट भी है। पास में जल विहार के विभिन्न साधन भी उपलब्ध हैं. प्राकृतिक वातावरण से ओत प्रोत यह स्थान सैलानियो का मन मोह लेता है। 



2...पायली



थोड़ा आगे चले तो "पायली" आपके इंतजार में पलके बिछाऐ बैठा है। नर्मदा नदी के मध्य में बने इस प्राकृतिक टापू पर सैलानी नाव से जा सकते हैं और कुछ समय बिता कर वापस आ सकते हैं।


जिज्ञासू और खोजी पर्यटक गाईड ले कर बरगी के घने जंगल में चार पाँच किलोमीटर ट्रेकिंग करते हुए एक विचित्र स्थान तक पहुँचते हैं, जहाँ पाँच से छह फुट लम्बे अठारह इंच चौड़े षटकोणीय आकार मे तराशे पत्थर हज़ारों की तादाद में वर्षों से पड़े हैं। ऐसा लगता है इन्हें किसी मशीन से तराशा गया है। इनका निर्माण क्यों एवं कब किया गया पता नहीं चल सका हैं. यह रहस्य ही है। कुछ लोगों का यह भी कहना हैं कि ये पत्थर भूगर्भ हलचल के पश्चात  निकले हैं।



3...भेड़ाघाट,



बरगी से सत्ताईस  किलोमीटर पर किसी  चित्रकार की परिकल्पना को  प्रकृति ने अद्भुत रूप में यथार्त में रच दिया है। यह  भेड़ाघाट हैं, बरगी से यदि आप जाए तो तिलवारा पूल  के पहले अपनी कार  बाए मोड़ ले आप सीधे रोप वे तक  पहुँच जायेंगे रोप  वे से नर्मदा जी के  उस पार ही धुआँधार की पानी की फुहारे  आपके इन्तजार में हैं।


4...चौसठ योगिनी मंदिर...

थोड़ा रूक कर 5  किलोमीटर दूर  चौसठ योगिनी मंदिर 150  सीढिया चल कर पहुंचा जा सकता है। चौसठ योगिनी मंदिर भारत के सबसे पुराने विरासत स्थलों में से एक है। यह 10 वीं शताब्दी ईस्वी में कलचुरी साम्राज्य द्वारा बनाया गया था और संरचना में खजुराहो के मंदिरों की तरह है। इसे मुख्य रूप से स्थानीय ग्रेनाइट से बनाया गया था। मंदिर में 64 योगिनियों के साथ देवी दुर्गा का वास है। एक योगिनी माँ देवी की एक महिला परिचर है, जो अंतर्दृष्टि और मुक्ति के माध्यम से उग्र जुनून के साथ भ्रम को खत्म करती है।यह नर्मदा नदी के पास और भेड़ाघाट में प्रसिद्ध संगमरमर की चट्टानें , जबलपुर से लगभग 18  किलोमीटर दूर स्थित है। हालांकि मंदिर को आंशिक रूप से नुकसान पहुंचा है फिर भी यह जबलपुर में शासन करने वाले प्राचीन राजवंशों के बारे में बहुत कुछ कहता है।


देवी माँ की मूर्तियों के अंदर और भगवान शिव दिव्य आभा लिए हुए हैं। मंदिर के परिसर में 95  मंदिर हैं, जिसमें मंदिर के चारों ओर 64  योगिनियाँ हैं, प्रत्येक योगिनियों के लिए एक और एक मुख्य मंदिर है। जहाँ भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती नंदी , पवित्र बैल पर सवार दिखाई देते हैं। मंदिर का डिज़ाइन सरल रखा गया है, लेकिन योगिनियों की मूर्तियों को उत्कृष्ट रूप से उकेरा गया है, प्रत्येक में एक अनोखी मुद्रा का चित्रण है।


संगमरमर की बेहद खूबसूरत चट्टानों  के मध्य बोटिंग यह विश्व में और कही नहीं है।



और अंत में,


5...घुघवा,जीवाश्म का खजाना,


जबलपुर से ठीक सौ किलोमीटर पर स्थित घुघवा के संम्बध में बहुत कम लोग जानते हैं।  यहाँ करोड़ों वर्ष पहले समुद्र की लहरे हिलोरे लेती थीं। विभिन्न किस्म के डायनासोर विचरण किया करते थे।


घुघुवा में पुरातत्व विभाग द्वारा पड़ताल के पश्चात यह रहस्य उजागर हुए हैं। यह तो इसका एक रूप है मगर मैं इसकी जिस खासियत की बात कर रहा हूँ वह है,  तैतीस करोड़ वर्ष पहले मिट्टी में दब चुकी लकड़ियों के बारे मे जो अब पत्थर के रूप में जीवाश्म बन चुकी हैं।


एक किसान द्वारा खेत जोतते वक्त इस तरह के कुछ पत्थर प्राप्त हुए बाद मे जब पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई की तो उन्हें ऐसे कई पत्थर मिलें जिसे एकत्र कर अब प्रदर्शन के रूप में पास बने कमरों मे रक्षित किया गया है। यह दिन भर बिताने लायक जगह है मगर लंच या ब्रेकफास्ट की  कोई व्यवस्था नहीं है।


अभी के लिए इतना ही।


हमेशा आनंद में रहें...


ईश्वर में आस्था रखे... और कुछ अच्छा पढ़ते रहें...


यह अच्छा है...


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