पातालकोट या हांडी खोह…..प्रकृति के छुपे खजाने....


पातालकोट या हांडी खोह…..प्रकृति के छुपे खजाने......


मोटर साइकिल चालको का एक दल जबलपुर से भेड़ाघाट होते हुए पंचमड़ी 248 किलोमीटर की दूरी तय कर पहुँचता हैं . दो दिन पंचमड़ी में बिताने के पश्चात सुबह 5-30 को पंचमड़ी से निकल कर सात बजे 50 किलोमीटर दूर "हांडी खोह" जिसे पातालकोट भी कहा जाता है, पहुँचता हैं...




प्रकृति द्वारा गढे गए इस स्थान पर जब आप पहुँचते हैं तो बस किकर्तव्यमूढ हो कर रह जाते हैं. पचीस मोटर साइकिलो का एक दल जब यहाँ पहुँचा, तो इसकी संरचना देख कर बस आवाक रह गया. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हैं, यह जगह एक हांडी की शक्ल में जमीन मे एक वृहत खड्ड की शक्ल अख्तियार कर घने जंगल के बीच न जाने कितने वर्षों से अपने भीतर कई राज छुपाऐ, मौन हो बैठी हैं.. गाईड के बगैर इस जगह जाने का अर्थ हैं, 'भटक जाना'. तो एक गाईड के मार्ग दर्शन में हम  अपने साथी राइडर्स के साथ इस खोह में छुपे रहस्यों की खोज में उतरते चले जाते हैं...



बेर, सीताफल, जामुन के फलदार वृक्षों और जंगलो के बीच हँसी मजाक करते हुए हम दो घंटो तक चलते रहें. इसी बीच गाईड ने बताया, " वर्षों पहले नागपुर से लगे क्षेत्रों में जब अंग्रेजो ने आक्रमण किया, तब वहाँ का आदिवासी राजा अपनी प्रजा के साथ इस हांडी खोह की भूलभुलैया में छुप गया. अंग्रेज वहाँ तक आऐ तो, मगर छुपे हुए राजा और उसकी प्रजा को न खोज सकें. कालान्तर में वे सभी वहीं रहने लगे. वे सब स्वाभिमानी थें. अंग्रेजो के गुलाम बनने से यह बेहतर था. वे जंगल में रहने के आदी थे. वे खेती करते और पशु पाल कर अपना गुजारा करते. बहोत जरूरी होने पर बाहर आते, मगर उनके जीवन का ज्यादातर वक्त वहीं गुजरता. आज भी वे आदिवासी वहीं रहते हैं...

एक प्राकृतिक झरने में देर तक स्नान एवं तत्पश्चात अपने साथ लाऐ लंच करने के पश्चात कारवाँ फिर पातालकोट के तल की ओर बढ़ गया.. आखिरकार सभी तल तक पहुँचे. अंदर से इस वृहत हांडी की किले जैसी ऊँची ऊँची दिवारे ( चित्र देखे ) देख कर प्रकृति की इस कला पर आश्चर्य चकित हुए बिना रहा नहीं जा सकता था.. पातालकोट के तल में ठंडक थीं. पहाड़ो से नीचे की और एक और झरना बह रहा था. पानी ने चट्टानों को काट कर अपने लिये बहने लायक जगह बना ली थीं.

एक किवदंती के अनुसार यहाँ से एक रास्ता पाला याने भू गर्भ तक जाता है. यहीं एक गुफा में रामायण काल में  मेघनाथ ने तपस्या भी की थी.




वापस लौटने का वक्त हो चला था. तभी गाईड गायब हो गया. देर तक इंतजार करने के पश्चात हमने उसके बिना चल पड़ने का एक गलत निर्णय ले लिया. एक घंटे तक चलने के पश्चात हम वहीं पहुँच गए जहाँ से चले थे. हमारा गाईड हमे वहीं इंतजार करता हुआ मिला. वह सत्रह अठारह वर्ष का लड़का था. पूछा तो बड़े भोलेपन से जवाब दिया, "भोजन के लिये चला गया था." खैर इस तरह की घटनाऐ होती रहती है..

हांडी खोह से बाहर आने तक सूर्य के ढलने का वक्त हो चला था. सुनहरे रंग की लालिमा लिये आकाश एक ओर चद्रमा का स्वागत तो दूसरी ओर सूर्य को कल सुबह तक विदा करने को प्रस्तुत था. सभी लोग अपने अपने कैमरे से प्रकृति के इस नायाब दृश्य को कैद करने की कोशिश में थे.... प्रकृति की थाह पाना क्या मानव के बस में हैं ? प्रकृति सदैव से हैं और रहेगी. मानव जब न था तब से प्रकृति अपने पूर्ण अस्तित्व में हैं. प्रकृति से मानव हैं. वह प्रकृति का एक अंग हैं....यह सिलसिला अनवरत चलता आ रहा हैं... आकाश से कल फिर आने का वादा कर और चंद्रमा को अपनी रश्मियाँ से जमीन को रौशन करने का एक अवसर दे कर सूर्य किसी और धरा को जगमगाने निकल पड़ा था...







समाप्त 

 और अगली बार फिर किसी नए सफर पर... 

 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
 You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action. Never consider yourself to be the cause of the results of your activities, and never be attached to not doing your duty. - Bhagavad Gita, Chapter II, Verse 47

कार चलाते  समय सीट बैल्ट ज़रूर बांधे....
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