यात्रा वृतांत_3 ( कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में....)

 यात्रा वृतांत __3





कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में...


तीसरा एवं अंतिम भाग




अभी तक आपने पढ़ा मढेरा स्थित "सूर्य मंदिर" एवं "रानी की वाव" साथ में पटोला साडी म्यूजियम के सम्बन्ध में , अब आगे पढ़िए…



देखिये मैने इस सफर के कुछ रूल बनाऐ हैं हर संभव मैं इन नियमों का पालन करता हूँ. बेशक यात्रा का आनंद लेने हेतु आप भी करें।


रूल नं. एक

यदि साथ में ड्रायव्हर नहीं है, तो हर सुबह यात्रा की शुरूआत के पूर्व डीजल, स्टेपनी, टायरों मे हवा एवं टूल्स चैक करना जरूरी है।



रूल नं. दो,

डीज़ल या पेट्रोल हॉफ तक आने पर टैंक फुल कर लेना चाहिये। माना कि हम हाईवे पर हैं, लेकिन नियम तो नियम हैं। एक बार मैं महाराष्ट्र की ट्रिप पर था तब हमारी गाड़ी का डीजल खत्म हो गया। कर दिया न ड्रायव्हर ने नियमों का उल्लंघन तो बड़ी मुसीबत हो गई थी।


रूल नं. तीन,

किसी भी कीमत पर हाईवे नहीं छोडना है। हाईवे पर आपको ट्राफिक मिलता है, ढाबे और पंक्चर रिपेयरिंग की दुकाने मिलती हैं, यहाँ आप अकेले नहीं होते।



रूल नं. चार,

थकान या नीन्द आने पर कार नहीं चलाए। देखिये आपका शरीर हर हाल मे आपका साथ देता है, मगर आप स्पीड मे जा रहे हो तो भी नींद के झोके आ ही जाते हैं। गाड़ी किनारे खड़ी कर एक पावर नेप ले कर तरोताजा हो कर फिर निकलिये।



रूल नं. पाँच ….

हमेशा सीट बैल्ट बांधिये और सतर्कता से वाहन चलाए। आप ड्राइवर नहीं हैं, सो कोशिश करें शाम चार बजे अधिक से अधिक पाँच बजे तक अपने आपको एवं गाड़ी को विश्राम देते हुए नजदीक किसी होटल की तलाश करें।



24.12.2018 01.30PM


दोपहर के एक तीस होना चाहते हैं। दिसंबर की ठंड भले ही हो मगर कार का एयर कंडिशन लगातार पूरे सफर के दौरान चालू रहता है। इतना चलने के बाद भी मेरी ऐंजिल कूल रहती है और मूझे भी कूल रखती है। मैने कहा न एक तीस होना चाहते हैं, हालाँकि हम नाश्ता कर के चले थे मगर घूम भी रहें हैं सो ऊर्जा का ह्रास भी हो रहा है। भूख लगना स्वाभाविक है, मगर रास्ते पर कोई ढ़ाबा आऐ तो। बड़ी देर से कोई ढ़ाबा नहीं आया। रास्ता बहुत बढ़िया है।


अहमदाबाद से भुज की दूरी 500 किलोमीटर है। यह हाईवे है। सड़क पर ट्रैफिक ज़्यादा नहीं है या यूँ कहा जाएं फोर लेन होने की वजह से गाड़ियां तेजी से निकल जाती हैं। दूर दूर तक फैले मैदान हैं। जगह जगह पवन चक्कियाँ लगी है , मगर जंगल कही नहीं है।


थोड़े समय पश्चात कुछ नजर आता है। हाँ यह ढाबा ही है। मैं ऐंजिल को छाँव में लगा देता हूँ और लंच आर्डर कर देता हूँ। पैर सुस्ताना चाहते हैं, मगर ये अंदर कमरे से क्या आवाजे आ रहीं हैं। दरवाजा थोड़ा खुला है, बुरके मे कुछ महिलाएं और बच्चे हैं, मगर ये मुस्लिम नहीं बोरे हैं। बोरे महिलाओं के बुरके बिल्कुल काले नहीं होते। वहाँ दाढ़ी वाले कुछ पुरूष भी हैं वे शायद टुरिस्ट हैं, या शायद किसी यात्रा पर जा रहें हो।


वेटर प्लेट लगा चुका है, प्याज और नीम्बू भी एक प्लेट मे रख जाता है, मगर मैं उसे पूरा सलाद लगाने को कहता हूँ। तभी पुलिस की दो तीन जीपे आ कर रूकती हैं। यार ! ये आखिर माजरा क्या है ? लेकिन कोई बात नहीं। वे यहाँ खाना खाने आऐ हैं. फिर चले जाएंगे। माहौल समझने मे थोड़ा वक्त लगता है। मजे की बात हैं इस ढाबे का मालिक एक मुस्लिम या फिर बोरा है और यह प्योर वेज ढाबा है। मैं आपको जानकारी दे दूँ, या शायद आप जानते भी हो, कुछ मुस्लिम भी शुद्ध शाकाहारी होते हैं। पुलिस ने अपना अपना स्थान यानी टेबले सम्हाल ली हैं। हमारा खाना भी लग चुका है। यह स्वादिष्ट है। ये मुसलमान खानसामे भी क्या गजब का खाना बनाते हैं, बस जान डाल देते हैं।


वैसे सफर में खाने का भी एक नियम है, तो यदि आप कार चला रहे हो तो दोपहर में कम खाऐ ताकि नींद न आऐ…


"यार मैं घूमने निकला हूँ। सजा पाने नहीं तो मैं यह नियम नही मानता…..खाने के बारे मे कुछ बोलने का नई।"

शाम हो चली है। भुज आने को है। मैं आपको बताऊ मैने पूरे सफर में पहले से कहीं भी कोई भी रूम बुक नहीं किया। जब मेरी योजना ही अनिश्चित है तो रूम बुक करवा कर मैं उस होटल मालिक के फोन पर फोन पर फोन का जवाब क्यों देता रहू ? वो मेरा बास नहीं हैं जो मुझे बार बार समय पर आने की तस्कीद करता रहें।


6.00PM

भुज आ चुका हैं, मगर हमें और आगे नखरताना तक जाना है। आज और कल की रात वही रूकना है। चलिये हम गुजरात के इस भाग को दो भागों में बाँट देते हैं।

पहला मातानी मद, नारायण सरोवर, कोटेश्वर महादेव, लखपत एवं गुरूद्वारा और मांडवी, तो इस पहले भाग के लिये नखरताना में अपना पड़ाव डालते हैं।

अहमदाबाद से मैने गणना की कि मुझे नखरताना पहुचने में रात के दस बज जाएंगे तो मैंने नेट से होटेल गेलैक्सी मे एक कमरा बुक किया। यह होटल मुख्य मार्ग पर स्थित था। वैसे तो यह जगह इतनी छोटी है कि पूरा का पूरा कस्बा ही मुख्य मार्ग पर बसा है।


तो होटेल गेलैक्सी वैसी बिल्कुल नहीं है जैसा की मैंने सोचा था। प्रवेश द्वार पर कोई न था। कुछ बच्चे खेल रहे थे, जो शायद मैनेजर के रहे होंगे। वो हमें देखते ही अंदर भाग गए। कुछ देर के इन्तजार पर छड़ी टेकता हुआ मैनेजर आया यह एक मल्टीपर्पज़ व्यक्तित्व था। उसने सभी काम सम्हाल रखे थे. वो बड़ी विनम्रता से बात कर रहा था।


“सर छोटी जगह है, स्टाफ के नाम पर सिर्फ मैं और मेरी बीबी ही है.” उसने अपनी व्यवस्था का विवरण दिया।


“खाने की व्यवस्था नहीं है, मगर पास में आपको अच्छा गुजराती खाना मिल जायेगा। चाय की एक दूकान नीचे है। पानी मैंने रख दिया है। रूम की सफाई मेरी बीबी कर देगी।”


उसने यह सब एक श्वास में कहा। शायद उसे डर था कहीं हम चले न जाएं मगर इस रात के इस वक्त मेरा कहीं जाने का विचार न था। कमरा अच्छा था. ए.सी. और टीवी काम कर रहे थे। हालाँकि ठंड इतनी थी कि ए.सी. की आवश्यकता ही नहीं पड़ीं। तो यहाँ हम दो दिन रूकेंगे।

08.30 PM नखरतना….

सामान रख कर हम इस कस्बे में भोजन की खोज में निकल पड़ते हैं। अमूल की एक शाप खुली है। मै दूध का एक पैकेट यह सोच कर ले लेता हूँ कि किसी चाय कि दुकान पर इसे गर्म करवा लूँगा। मगर सभी दुकाने बंद हो चुकी हैं। एक बढिया गुजराती थाली पा कर मन तृप्त हो चला है। लौटते समय नीलम को उस पैकेट की याद आती है। एक आइसक्रीम शाप अभी भी खुली है, यह कह कर कि सुबह हम पैकेट वापस ले लेंगे। वे उससे बात कर फ्रीजर में पैकेट रखवा देती हैं. क्या ऐसा हो सकता हैं ? जी हाँ ! बिल्कुल हो सकता हैं , ये पत्निया सब कुछ कर सकती हैं।


25.12.2018( 227km/2285km) 9.25 सुबह

उस पैकेट की याद आती है अब यह किस्सा भी साथ साथ चल रहा है और रोचक हो चला है। आइसक्रीम शाप वाला बड़ा ऐम्ब्रेस्ड है,


“…मैडम वह तो लड़के ने बेच दिया, मगर आप चिन्ता न करें मैं आपको दूसरा देता हूँ…”


वो बार बार “सारी” कहते हुए दूसरा पैकेट दे देता है।

हम जाने लगते हैं।

“मैडम ठहरिये.. ये आपके पैसे, ”

वह दो रूपए काउंटर पर रखते हुए कहता है।

मुझे उसकी ईमानदारी पर फख्र होता है।

चलिये यह किस्सा खत्म हुआ। बाद में इस किस्से को याद कर हम खूब हंसे।


होटल गैलेक्सी के नीचे चाय वाले ने दूध गर्म कर ग्लास को पूरा भर दिया है।


10.25 AM

माता नो मध याने आशापुरा माता का मन्दिर रास्ते में ही है। भीड़ है, मगर दर्शन हो जाते हैं। मंदिर कच्छ जिले के लखपत तालुका में एक गाँव में है। गांव एक छोटी सी स्ट्रीम के दोनों तट पर पहाड़ियों से घिरा हुआ है, और आशापुरा माता मंदिर के लिए समर्पित है , जडेजा के शासकों संरक्षक देवता भी माना जाता है। यह गाँव भुज से कच्छ जिले के मुख्यालय से लगभग 105 किलोमीटर दूर स्थित है।


गुजरात के दूसरे देवस्थानों की भाँति यहां भी भक्तों को रात में ठहरने की व्यवथा है, अब नारायण सरोवर लखपत की ओर चलते हैं। श्रीमद भागवत पुराण में इन पंच सरोवरों का वर्णन है। भारत मे कुल चार पवित्र सरोवर हैं , जबकी पाँचवा सरोवर मानसरोवर है। जो चीन तिब्बत में है।





पुष्कर सरोवर, राजस्थान में,

बिन्दू सरोवर, सिधपुर गुजरात में,

नारायण सरोवर गुजरात में,

पंम्पा सरोवर, कर्नाटक, तुगभद्रा नदी के पास…


भगवान् श्री के मंदिर के समीप बने नारायण सरोवर में अभी भी पर्याप्त जल है, कौन इस सरोवर की हजारो हजार वर्षों से रक्षा करता आ रहा है...? श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि पुत्र प्राप्ति के लिये दसपचेत्स् ने जल में खड़े होकर 10 हजार वर्ष तक रुद्र जाप किया। चलिए अब चलते हैं कोटेश्वर महादेव के दर्शन को।


1.00PM कोटेश्वर महादेव।

विशाल लहराते समुद्र से लगे मंदिर में बिराजे हैं "कोटेश्वर महादेव," जो अनंत के स्वामी हैं। सम्पूर्ण त्रिलोक उनका धाम है। हिमालय से महासागर तक आकाश से पाताल तक उनकी सत्ता है, जहाँ मर्जी हो वास करते हैं।

हुआ यह था कि रावण ने उन्हें अपनी तपस्या से प्रसन्न कर साथ चलने को राजी कर लिया तो भोले बस साथ चल पड़े रावण के साथ। लेकिन जब इस स्थान से गुजरे तब शायद यह स्थान प्रभु को भा गया। अब उनका एक रूप सदा के लिए यही बस जाएगा। प्रभु यह भी जानते ही थे, यही रावण आगे चल कर सीता जी को हरने वाला है। बस प्रभु ने तय कर लिया रावण के साथ लंका गए तो असत्य के जीत होगी। प्रभु की इच्छा यही बिराजने की हुई, अपने भक्तो के साथ। सो रावण की मति इस तरह फेरी कि रावण ने शिवलिंग इस स्थान पर गिरा दिया या ब्राह्मणो द्वारा एक फसी हुई गाय को निकालने का निवेदन मान कर शिवलिंग यही रख दिया...कौन जाने... जब लौटा तो देखा मगर हज़ारो कि संख्या में शिव लिंग प्रगट हुए और रावण शिवलिंग ढूढ़ न सका अंततः एक शिवलिंग ले कर गंतव्य को रवाना हुआ... तबसे प्रभु यही बसे हैं। असली शिवलिंग के आसपास मन्दिर बना दिया गया।







यह क्षेत्र पूर्ण सुन्दरता के साथ विकसित किया गया हैं और समुद्र किनारे का सुरम्य वातावरण कुछ इस तरह शान्त हैं कि यहाँ से जाने का मन नहीं करता। पाकिस्तान पास ही है सो नौसेना सेना के जवान स्पीड बोट मे सीमा की सतत रखवाली करते हुए देखे जा सकते हैं। हम सूदूर गूजरात में अपने घर से 2300 किलोमीटर दूर आ गऐ हैं। यहाँ से तो गुजरात की ही नहीं बल्कि देश की भी सीमा समाप्त हो जाती हैं और इसके पश्चात या तो समुद्र हैं या फिर पाकिस्तान की सीमा प्रारंभ होती है।


आगे लखपत किले की दिवारो का रहस्य और किले के भीतर गुरूद्वारा कैसे बना यह जाने बिना यहाँ से वापस जाना न्यायोचित नहीं होगा ?


3.00PM

बस कुछ ही दूरी पर है लखपत और ये लीजिए आ गए। एक वृहत दरवाजे से इसके भीतर प्रविष्ट तो हो गए मगर भीतर कुछ नहीं बस एक खाली मैदान है। एक छोटा सा गुरूद्वारा है बस। तो यहीं है लखपत ? जब भीतर कुछ है ही नहीं तब इतनी बड़ी चहारदिवारी के निर्माण का औचित्य आखिर क्या है ? असल कहानी तो हमेशा की तरह गाईड के आने के पश्चात ही प्रारंभ होती हैं और सारे सवालों के जवाब धीरे धीरे मिलने प्रारंभ हो जाते हैं।





ये उस वक्त की बात है जब इस स्थान पर गुजरात का बंदरगाह हुआ करता था। जहाज अरब और दूसरे देशो से जिवनोपयोगी सामान ले कर यहाँ आया करते थे। तब यहाँ समुद्र भी हुआ करता था जो अब सूख चुका है। तो जहाज जो सामान लाया करते थे, उसे चोरों और डकैतों से सुरक्षित रखने के लिये यह चहारदिवारी बनाई गई। एक तरह से यह स्टाक यार्ड था। शाम के बाद दरवाजे बंद कर दिये जाते थे। सुरक्षा के लिये बंदूकों और तोपो का इस्तेमाल होता था। समुद्र सूखने और व्यापारिक केन्द्र के परिवर्तित हो जाने के कारण कांडला, भावनगर और हजीरा मे नए बन्दरगाह बनाऐ गए और मार्गो द्वारा सामान देश के अन्य भागों मे पहुचाया जाने लगा। वर्तमान में मुख्य बंदरगाहों में मुंद्रा, पीपावाव, हजीरा, दाहेज, जामनगर, सिक्का बंदरगाह प्रमुख है।


गुरूद्वारे की कहानी यह हैं कि अरब देशो का भ्रमण करने हेतु गुरूनानक देव अपने जहाज का इंतजार करते हुए यहाँ कुछ देर के लिये रूके थे उनकी याद में गुरूद्वारा बना दिया गया। दरअसल इसी बहाने इस क्षेत्र की कुछ सुरक्षा हो जाती है वरना यह जगह सूदूर गुजरात में होने की वजह से कई असामाजिक तत्वों भूमाफिया का बसेरा बन सकती हैं. जब हम पहुचे तो सिखो एवं अन्य टूरिस्ट की भीड़ थीं।


5.00PM

हम वापस नखरताना पहुँच चुके हैं। कल माडवी बीच और कुछ शापिंग।



26.12.2018

9.50 (126km/2411km)11.00AM

मांडवी बीच सिर्फ और सिर्फ आखेट करने के लिये बना है। यहाँ हाई या लो टाईड की समस्या नहीं हैं और समुद्र की लहरे सारे दिन तट से टकराती रहती हैं।पैरा सोलिंग ,स्पीड जेट बोट और कई तरह के वाटर स्पोर्ट उपलब्ध है।







कहा जाता है, भारत में हर पाँच सौं किलोमीटर पर खान पान कपड़े भाषा और बोली बदल जाती है। यह बात यहाँ साफ़ नजर आती है। कच्छ के वस्त्रों और अहमदाबाद या सूरत के वस्त्रो में विभिन्नता साफ दृष्टिगोचर होती है। मांडवी में गुजराती खास कर कच्छ क्षेत्रों की साड़ियाँ, चादर एवं पारंपरिक वस्त्रों की भरमार है। जिसमे रंगो की भरमार है। आप सिर्फ देखने का भी निश्चित कर निकले हो मगर कुछ ले कर न लौटे हो ऐसा हो ही नहीं सकता और जैसा कि मैने पहले कहा था पत्नीजी ने कम सामान लाने की भरपाई यहाँ खरीददारी कर पूरी कर ली। खैर यह सामान अब सीधे गृहनगर तक जाना है, तो अब मेरी चिन्ता का विषय नहीं था।


"विजय पेलेस" मैं नहीं देख पाया मगर यदि आप मांडवी तक गए हो तो इसे छोड़ कर आना भूल हो सकती है।

‘हम दिल दे चुके सनम’ जैसी कई फिल्मों की शूटिंग के लिये यह बालीवुड का पसंदीदा स्थान रहा है.यहाँ भी गुगल ने बाजार की तंग गलियों में से मुझे निकाल कर मुख्य रास्ते तक पहुँचाया ।


जब आप ऐसे किसी लम्बे टूर की योजना बनाऐ तो हर चार या पाँच दिनो में एक पूरा दिन सिर्फ अपनी थकान मिटाने के लिये रखे इससे आपमें घूमने की ऊर्जा बनी रहेगी। विदेशी लम्बे समय के लिये भारत आते हैं और बड़े आराम से घूमते हैं। मेरी अब तक की इस यात्रा ने मुझे जो अनुभव दिये वो बेशक आगे काम आने वाले हैं। वैसे आप गुजरात का मैप देखे तो पाएँगे यह बहुत फैला हुआ नहीं है। एक बार आप गुजरात पहुँच जाऐ फिर हर गंतव्य 150-200 कि.मी. के भीतर ही है, मतलब आपका समय घूमने मे ज्यादा और यात्रा में कम खर्च होता है मगर आप जब सड़क मार्ग से जा रहें होते है, तब भी तो कई शहर गाँव एवं सभ्यताओं से वाकिफ होते रहते हैं, तो इस लिहाज से मेरी यात्रा किसी गंतव्य तक पहुँचने की न हो कर बल्कि मेरे लिये सम्पूर्ण गुजरात ही एक गंतव्य था और मैने इसी दृष्टि को आखिर तक कायम रखा।


मांडवी मे भोजन के लिये “ओशो भोजनालय” सर्वश्रेष्ठ है। इनकी परोसगारी भी विचित्र है। ये लोग भोजन परोसते नहीं बल्कि पूड़ी, चावल, भजिये या जलेबी का पूरा थाल ही आपके सामने रख देते हैं। बिल्कुल घर जैसे। जो चाहिए, जितना चाहिए ले लीजिये। इससे मन भर जाता है, एक तृप्ति का एहसास होता है।


6.25PM

अब अगला गंतव्य भुज है। होटल तुलसी रेसीडेंसी भुज चमक दमक से भरी एक शानदार होटल है। सभी कर्मचारी बाकायदा अपनी यूनिफार्म में हैं और अपना काम मुस्तैदी से कर रहे हैं। हर आदेश का त्वरित पालन होता है. होटल के भीतर ही लगा हुआ रेस्टोरेंट भी है।


"सर आपका नाश्ता सुबह आठ बजे तैयार हो जाएगा..." मैनेजर ने कहा।

वो गुजराती अंग्रेजी हिंदी और मराठी भी फर्राटे से बोल रहा है। उसने कार से सामान लाने एक आदमी भेज दिया है, नखरताना में जो आस टूट चुकी थी फिर एक नया विश्वास जाग उठता है... मगर मुझे फर्क नहीं पड़ता... यहाँ समय कीमती है .....समय पर जो मिल जाए बेहतर है।


यह होटल चहल पहल से भरी व्यवसायिक और पर्यटक दोनों के लिये उपयुक्त है। बाद में पता चला शहर मे इनकी तीन और होटले भी हैं , मगर उनके पास एक ही दिन के लिये कमरे खाली थे और मुझे दो दिन ठहरना था तो मेनेजर ने दूसरे दिन के लिए उनकी एक और होटल “होटल कच्छ रेसीडेन्सी” मे एक कमरा दे दिया।


27.12.2018

08.45( 218km/2629km) 3.00PM

धोरडो का ह्वाईट डेजर्ट कई किलोमीटर तक फैला हुआ और जमे हुए शुद्ध नमक का सफेद रेगिस्तान है। यह प्रकृति द्वारा निर्मित वह स्थान है जहाँ कुछ देर के लिये लगता है हम किसी और ग्रह पर आ गए हैं। आँखो को हरी जमीन देखने की आदत है और यहाँ जमीन सफेद यानी सिर्फ सफेद दिखाई देती है। धोरडो में नमक का यह सफेद रेगिस्तान बिल्कुल सपाट है, जो नमक के क्रस्ट का एक विशाल विस्तार है। यह किलोमीटरों तक फैला है। आमतौर पर सूर्य और चंद्रमा के नीचे चमकने वाले सफेद कठोर नमक के क्रस्ट का निर्माण तब होता है जब पानी के वाष्पीकरण की दर वर्षा की दर से अधिक हो जाती है। इससे नमक जमीन पर एक मोटी लेयर के रूप में रह जाता है। गुजरात सरकार ने यहाँ एक टावर बनाया है, जहाँ से आप प्रकृति के इस नायाब रचना से रूबरू हो सकते हैं ।टॉवर को डिजाइन करते समय नमक के अणुओं की प्रेरणा ले कर के इसकी संरचना की गई है।







( चित्र देखे )


"रण आफ कच्छ" देखने और इसे महसूस करने के लिये गुजरात टूरिज्म प्रति वर्ष शीतकाल में टेन्ट सिटी का अस्थाई निर्माण करता हैं... शाम हो चली थीं अब सूर्यास्त होने ही वाला था थोड़ी ही दूर पर काला डूगर (पहाड़) हैं एक अजनबी (ईश्वर का भेजा हुआ तीसरा आदमी ) से पूछता हूँ।


“सन सेट कहा ज्यादा अच्छा होता है ?”

वह व्हाईट डेजर्ट का नाम लेता है।

“ ठीक हैं हम काला डूगर देख कर आ जाएंगे..”


“ आप शायद न आ पाए वह दूर है।”

उस अजनबी ने कहा।


मैंने अपनी कार काला डूगर के रास्ते पर रख दी है। यह रास्ता इतना सकरा है कि बस एक कार चल सकती है।बायी तरफ व्हाइट डेजर्ट है। उसके पास काली रेत है, फिर जो जमीन है वह घास फूँस वाली जमीन है। चारों तरफ जहाँ तक नजर जाती है मीलो फैला मैदान है। वास्तव मे यह रास्ता लम्बा है। बीच बीच में कुछ गाड़ियाँ क्रास हो जाती हैं।


काला डूगर की पहाड़ी की चढ़ाई शुरू होने वाली है। आगे एक चाय की दूकान है। मैं जरा देर को रूकता हूँ, चाय पीकर हम चल देते हैं।


काला डूगर में करों की भरमार है। उपर दत्त मन्दिर है। हर रोज दोपहर को यहाँ गुढ़ और खीचड़ी का भोग लगता है। जिसे कुछ दूर बने एक चबूतरे पर रख दिया जाता है। कुछ देर में कुछ सियार आ जाते हैं और सारा प्रसाद चट कर जाते हैं।


किवदंती है कि दत्त भगवान जब इस चबूतरे पर बैठे तो भूखे सियारों ने उन्हें घेर लिया तब दत्त भगवान छूरी से अपने हाथ और बाह का मांस काट काट कर उसे खिलाने लगे। बाद यहाँ एक मन्दिर बना दिया गया और तब से नित सियारो की भूख मिटाने को गुढ़ खीचड़ी का भोग लगाया जाता है।


समुद्र के सूख जाने के पश्चात काली रेत छोड़ गया. यह रेत भी कई किलोमीटर तक फैली है।






इसे देखना भी अपने आप में एक अनुभव है। सूर्यास्त का समय हो चला है। मैं यही कुछ वक्त रूकने का फैसला करता हूँ। समय कम है। शायद व्हाइट डेज़र्ट न पहुंच सकूँ। सच ही तो कहा था उस अजनबी ने।


7.00PM भुज पहुँचते पहुँचते सात बज ही जाते हैं। भुज जैसा मैने सोचा था उससे कहीं बड़ा शहर हैं और व्यवस्थित रूप से बसाया गया है।


28.12.2018 ( 389km/3018km) 09.00AM द्वारका की और…


भुज द्वारका मार्ग कुछ अच्छा नहीं है। समय और डीज़ल दोनों का अपव्यय है। जब गुजरात सरकार पर्यटन का विकास कर रहीं है तो कृष्ण नगरी तक पहुंचाने वाले मार्ग को दुरुस्त रखने की नितांत आवश्यकता है।


धीरूभाई अम्बानी का गाँव रास्ते पर नज़र आता है.


1.30PM दोपहर के देढ बजे एक ढाबा नज़र आता है। छह सात लोग और बैठे हैं कुछ परिवार भी है। काउंटर पर बैठा मेनेजर ( पाठक कृपया ध्यान दे यह मेनेजर हमारा चौथा और अंतिम आदमी है ) लड़कों को टेबल पर पानी और आर्डर सर्व करने को कह रहा है।वह मेरे पास से गुजरा।


मैंने उससे कहा, "...तमारा ढाबा सारो छे.."


उसने कहा ,

"....मैं गुजराती नहीं बल्कि मुम्बई से हूँ।"


और इसके पहले मैं कुछ कहूँ। उसने मुझे कुछ जानकारिया दी।


"पहले इस क्षेत्र में कुछ न्यूसेन्स था। खास कर रात के वक्त कुछ लूटपाट वैगरह। खैर दिन में तो पुलिस की गाड़िया राउंड पर होती हैं, सो दिन मे डर की कोई बात नहीं है।"


इसके अलावा उसने इस जगह के बारे में कुछ और जानकारियाँ भी मुझे दी। मैंने इस बारे में कुछ पूछा नहीं था। हम पिछले दस बारह दिनों से निर्भीक हो कर गुजरात में घूम रहें थे। ढाबे मेनेजर का लूटपाट के बारे में बात करना मुझे कुछ अजीब लगा।


खैर हम लंच ले कर आगे बढ़े।आगे गूगल ने हाईवे छोड़ते हुए एक दूसरे रास्ते पर मोड़ दिया। ( नियम नंबर तीन का उल्लंघन ) मैं हाईवे छोड़ना नहीं चाहता था। परंतु गूगल ने मेरे दिमाग पर कब्जा कर लिया था। आखिर उसने अब तक कोई तीन हजार किलोमीटर रास्ते का दिशा निर्देश किया था, बिना कोई गलती किये, तो उस पर भरोसा करना लाजमी था। इस सकरे रास्ते पर कोई ट्राफिक नहीं था। हम चलते रहे। एक गाँव के थोड़ा पहले रास्ते को पत्थरों की एक लाईन लगा कर बंद कर रास्ते को गाँव की और मोड़ दिया गया था।


मुझे उस ढाबे वाले मेनेजर की चेतावनी याद आई। मैंने गाड़ी रोकी। यू टर्न लेते हुए पुनः उसी रास्ते पर चलने का फैसला लिया जिस रास्ते से आऐ थे। आगे रास्ते में अभी भी वह कार खड़ी थी। कपल अभी भी बहस कर रहा था। थोड़ी ही देर में ही हम हाईवे पर पहुँचे चुके थे मैंने तय कर लिया, अब हम इसी हाईवे से द्वारका की ओर जायेंगे। कभी कभी रस्ते से समुद्र के भी दर्शन हो जाते थे।


5.00PM द्वारका नगरी आ चुकी हैं. गोमती किनारे बसा यह मन्दिर वर्षों से आस्था और ऊर्जा का केन्द्र रहा है।













28.12.2019 8PM रात आठ बजे भी मन्दिर प्रांगण में बहोत भीड़ थीं। श्रीकृष्ण जी को शाम को सजाया जाता है. यह सजावट फूलों की होती है। कृष्ण जी की आभा बस देखते ही बनती है। श्रद्धालु भाव विभोर हैं।प्रभु की एक झलक पाने को आतुर हैं, मैं देख रहा हूँ दर्शनार्थियों की भीड़ है, एक झलक मिलते ही स्नेह आँखो से अश्रु बन कर बह निकलता है। मैं अपने सभी चित परिचित और मित्रो के लिए प्रभु से आशीर्वाद चाहता हूँ। आखिर उन्ही की वजह से तो मैं हूँ। गोमती नदी समुद्र से मिलती है। मन्दिर के पीछे समुद्र से चलने वाली हवा से ठंडक बढ़ने लगी थीं, मगर दर्शन अच्छे से हो चुके थे. मन प्रसन्नता से भर जाता है।



29.12.2018 5.30AM ( 73km/3091km)


कल रात दर्शन के पश्चात भी मन नहीं भरा। एक बार फिर मन प्रभु को देखना चाहता है। 5.30 को उठ कर 6.30 की आरती में शामिल होते हैं।


11.00am भेंट द्वारका के लिये नावे चलती हैं। पक्षियों का जमघट लगा है। अजीब अजीब आवाजे निकाल कर वे बोट के आसपास उड़ते रहते हैं। बाद मे समझ आया श्रद्धालू उन्हें खाने के लिये दाने दे रहे हैं।







6.00PM द्वारका से लगा हुआ समुद्र, गोमती नदी उस समुद्र में मिलती हुई और सूर्यास्त। यह सब मिल कर एक बखान न कर पाने वाला वातावरण निर्माण कर रहें थे। कुछ दी देर में सूर्य किरण से समुद्र का जल जगमगा उठा। सूर्यास्त हो चुका था. शाम को कुछ देर मंदिर में गुज़ार कर बाहर आ जाते हैं। पास ही लगे बाज़ार में भीड़ ज्यादा नहीं है। लोग चहलकदमी कर रहें हैं। लगता तो एक छोटा बाज़ार हैं, मगर दो घंटे घूमने के बाद भी ख़त्म नहीं होता बस एक भूल भुलैय्या की तरह है।

दुकाने छोटी हैं, मगर करीने से सजी हैं। सकरी गलियां हैं। मैं कुछ दुकानों को याद रख लेता हूँ ताकि बाहर निकल सकूँ। दो घंटे तक घूमने के पश्चात भी वापस लौटने की इच्छा नहीं हो रही है। वास्तव में जो मज़ा यहाँ है, वो बड़े बड़े मॉल में कहाँ ? हर दुकानदार जैसे आपकी राह देख रहा हो, आपके स्वागत में उत्सुक. मॉल में लगता है जैसे सब कुछ बेजान हो। जीवन तो यहाँ महसूस होता है। बस समझ लीजिये बनावटी और ताजे फूलो जैसा अंतर है।


एक कढ़ाव में दूध उबल रहा है, हम अंदर आ कर बैठ जाते हैं। कढ़ाव के पास एक आदमी बैठा है जो शायद मालिक है। दूध बनाने का उसका अपना तरीका है। कुल्हड़ भरने के पश्चात उसमे उसने मलाई और पिस्ते डाल दिए हैं और एक लड़का बड़े करीने से कुल्हड़ हमारे हाथो में थमा जाता है। बहुत दिनों तक मॉल में घूमने के बाद अब लगता है, मैं कोई वी.आई.पी. हूँ। जहां चैन के साथ कुछ देर बैठ सकता हूँ। दो व्यक्ति हमारी सेवा में लगे हैं। यही भारतीय परम्परा है। जहाँ दूकानदार के लिए ग्राहक भी अतिथि है।



30.12.2018 (255km/3346km) 09.45


द्वारका से महात्मा गाँधी की जन्मस्थली पोरबंदर सिर्फ 100 किलोमीटर पर है

यह रास्ता समुद्र के किनारे किनारे चलता हैं, रास्ते भर मार्ग के दोनों ओर क्यारियों में समुद्र का पानी भर कर सूखने के लिए छोड़ दि